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शक्ति परम है, जीवन के परम लक्ष्य को पा लेना इसका उद्देश्य है

Fri, 16 Aug 2024 01:43 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

स्वयं से स्वयं की भांति स्वयं के अनुरूप स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार और स्वयं से स्वयं का साक्षात मिलन होते देखा जा सकता है ।
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आध्यात्म - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कुछ घटनाएं आपके जीवन में अप्रत्याशित घटती हैं और कुछ घटनाएं आप स्वयं से निर्माण करते हैं। जो घटनाएं आपके वश में न होकर घट रही है वे सभी आपके लिए अति शुभ होती हैं क्योंकि वह सभी घटनाएं आपके भविष्य में महत्वपूर्ण रचनाओं का निर्माण करती हैं। आपका जीवन उन सभी अप्रत्याशित घटनाओं से प्रेरित होकर आपके सामने एक नई विचारधारा और कामनाओं को जन्म देता है। यह जानना बहुत आवश्यक है कि हम उन सभी रूपरेखाओं को किस तरह से प्रेषित करते हैं।

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हमारी समझ की गहराइयां उन सभी घटनाओं को एक धागे में पिरोती हैं जिनमें हमें अपनी हर परिस्थितियों को जोड़ने और उनमें तर्क निकालने का जरिया मिल जाता है। हमारा दृष्टिकोण और हमारी व्यवहारिकता इन्हीं सब कारणों से विकसित होती है।

आध्यात्म - फोटो : freepik
यूं तो मानव अपने किए कर्मों से प्रधान बनता है और प्रधानता देना आवश्यक भी है परन्तु यह जानना कि कर्म करने के लिए भी एक विस्मय ऊर्जा और उसके संचार की आवश्यकता होती है। बिना ऊर्जा स्तोत्र के मानव शरीर किसी भी कार्य को करने में असमर्थ है। हम इस शक्ति अर्थात ऊर्जा को अपनी वस्तु की भांति एक आम चीज समझकर अधिकार पा लेने के बाद उसकी चेष्टा से विमुक्त हो जाते हैं। यह आम सी चीज बन जाने के कारण हमसे अलग हो जाती है जिस कारण इसका अस्तित्व तभी समझ आता है, जब हमें गतिशील और शक्तिशाली होने का अभाव महसूस होता है l

आध्यात्म - फोटो : freepik
मानव इस समझ को विकसित करें कि यह ऊर्जा अर्थात भीतरी शक्ति ही इस मानव शरीर की उत्पत्ति और उसके अस्तित्व का परिचय है और यही उसकी वास्तविकता है तभी वह अपने असल जीवन जीने के उद्देश्य को समझ सकेगा। जीवन का असल रहस्य जान लेना और इस सत्य को समझ कर अपने जीवन के परम लक्ष्य पा लेना इस जीवन का उद्देश्य है। इसे सरल और कुछ नहीं।

आध्यात्म - फोटो : freepik
मानव जीवन की खोज असल में सिर्फ उन्हीं चीजों की खोज कर और प्राप्त कर पूर्ण होने तक रह जाती है जिन्हें वह स्वयं नश्वर होते और स्वयं से नाश होते देखता है। असल में जिस भी वस्तु का अस्तित्व समाप्त हो सकता है वह उस शाश्वत शक्ति अर्थात ऊर्जा से परे है। वह हम सब में व्याप्त है।
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आध्यात्म - फोटो : freepik
हम उस ऊर्जा अथवा शक्ति को जिस पल समझ और अपने अस्तित्व की एकमात्र पहचान और वास्तविकता समझने लगते हैं उसी क्षण हम अपने जीवन के लक्ष्य और अपने स्वरूप से साक्षात्कार कर लेते हैं। हमारी ऊर्जा अथवा हमारी शक्ति ही हमें हमारे स्वयं के होने का एहसास दिलाती है।
यह शक्ति परम है। इसको शब्दों में बताया नहीं जा सकता। इसको - " स्वयं से स्वयं की भांति स्वयं के अनुरूप स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार और स्वयं से स्वयं का साक्षात मिलन होते देखा जा सकता है ।" अब सबसे अहम और पहले वह आखिरी प्रश्न यह उठता है -कि मानव स्वयं से इस शक्ति की खोज क्यों नहीं करता ?
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