यूं तो मानव अपने किए कर्मों से प्रधान बनता है और प्रधानता देना आवश्यक भी है परन्तु यह जानना कि कर्म करने के लिए भी एक विस्मय ऊर्जा और उसके संचार की आवश्यकता होती है। बिना ऊर्जा स्तोत्र के मानव शरीर किसी भी कार्य को करने में असमर्थ है। हम इस शक्ति अर्थात ऊर्जा को अपनी वस्तु की भांति एक आम चीज समझकर अधिकार पा लेने के बाद उसकी चेष्टा से विमुक्त हो जाते हैं। यह आम सी चीज बन जाने के कारण हमसे अलग हो जाती है जिस कारण इसका अस्तित्व तभी समझ आता है, जब हमें गतिशील और शक्तिशाली होने का अभाव महसूस होता है l
मानव इस समझ को विकसित करें कि यह ऊर्जा अर्थात भीतरी शक्ति ही इस मानव शरीर की उत्पत्ति और उसके अस्तित्व का परिचय है और यही उसकी वास्तविकता है तभी वह अपने असल जीवन जीने के उद्देश्य को समझ सकेगा। जीवन का असल रहस्य जान लेना और इस सत्य को समझ कर अपने जीवन के परम लक्ष्य पा लेना इस जीवन का उद्देश्य है। इसे सरल और कुछ नहीं।
मानव जीवन की खोज असल में सिर्फ उन्हीं चीजों की खोज कर और प्राप्त कर पूर्ण होने तक रह जाती है जिन्हें वह स्वयं नश्वर होते और स्वयं से नाश होते देखता है। असल में जिस भी वस्तु का अस्तित्व समाप्त हो सकता है वह उस शाश्वत शक्ति अर्थात ऊर्जा से परे है। वह हम सब में व्याप्त है।
हम उस ऊर्जा अथवा शक्ति को जिस पल समझ और अपने अस्तित्व की एकमात्र पहचान और वास्तविकता समझने लगते हैं उसी क्षण हम अपने जीवन के लक्ष्य और अपने स्वरूप से साक्षात्कार कर लेते हैं। हमारी ऊर्जा अथवा हमारी शक्ति ही हमें हमारे स्वयं के होने का एहसास दिलाती है।
यह शक्ति परम है। इसको शब्दों में बताया नहीं जा सकता। इसको - " स्वयं से स्वयं की भांति स्वयं के अनुरूप स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार और स्वयं से स्वयं का साक्षात मिलन होते देखा जा सकता है ।" अब सबसे अहम और पहले वह आखिरी प्रश्न यह उठता है -कि मानव स्वयं से इस शक्ति की खोज क्यों नहीं करता ?