पैर में था कमल का चिन्ह
हिंदू धर्म में कई संप्रदाय हैं, जिनमें स्वामीनारायण संप्रदाय भी है। भगवान स्वामीनारायण ने इस संप्रदाय की स्थापना की थी। भगवान स्वामीनारायण का जन्म अयोध्या के पास छप्पय गांव में 3 अप्रैल 1781 को चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन हुआ था। इसकी वजह से राम नवमी के दिन उनकी जयंती मनाई जाती है।
स्वामीनारायण जी को सहजानंद स्वामी के नाम से भी जाना जाता है। उनके पिता का नाम श्री हरिप्रसाद व माता का नाम भक्तिदेवी था। उन्होंने स्वामीनारायण जी का नाम घनश्याम रखा था। कहा जाता है कि भगवान स्वामीनारायण के पैर में कमल का चिन्ह था, जिसे देखकर ज्योतिषियों ने कहा कि यह बालक लाखों लोगों के जीवन को सही दिशा देगा।
आठ साल की उम्र में ही शुरू कर दिया शास्त्रों का अध्ययन
भगवान स्वामीनारायण ने पांच साल की उम्र में अध्ययन शुरू कर दिया था। आठ साल की उम्र में उनका जनेऊ संस्कार हो गया, जिसके तुरंत बाद उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन करना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि बेहद कम समय में उन्होंने कई शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। सिर्फ 11 साल की उम्र में उनके माता पिता का देहांत हो गया। इसके कुछ समय बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और देश भ्रमण पर निकल गए। भ्रमण के दौरान वह लोगों से मिलते, सत्संग करते और प्रवचन देते। उनकी ख्याति तेजी से फैलने लगी और उनके अनुयायी बढ़ने लगे।
उन्होंने सात साल तक देशभर की परिक्रमा की। स्वामीनारायण को लोग नीलकंठ वर्णी कहने लगे। कुछ समय बाद स्वामी रामानंद ने उनको पीपलाणा गांव में दीक्षा दी और उनका सहजानंद नाम रख दिया। एक साल बाद रामानंद ने सहजानंद को अपने सम्प्रदाय का आचार्य पद भी सौंप दिया। स्वामी रामानंद के देहांत के बाद सहजानंद गांव-गांव जाकर नारायण मंत्र का जप करने और भजन करने के लिए लोगों को प्रेरित करने लगे।
स्वामीनारायण संप्रदाय की स्थापना
कहा जाता है कि जगह-जगह ज्ञान और अध्यात्म की अलख जगाने के दौरान वह गुजरात पहुंचे और यहां उन्होंने स्वामीनारायण संप्रदाय की स्थापना की। स्वामीनारायण संप्रदाय और इस संप्रदाय के अनुयायियों के माध्यम से उन्होंने समाज में फैली कई कुरीतियों को दूर करने में अपना योगदान दिया। उन्होंने विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य भी चलाए। स्वामीनारायण के इस सेवाभाव के कारण ही लोग उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे।
भगवान स्वामीनारायण ने अपने शिष्यों को दार्शनिक सिद्धांतों, नैतिक मूल्यों, अनुष्ठान आदि की शिक्षा दी। मानव जाति और धर्म के लिए सेवाभाव की प्रेरणा देते हुए उन्होंने साल 1830 में अपने प्राण त्याग दिए। स्वामीनारायण संप्रदाय में कई गुरु हुए, जिन्होंने भगवान स्वामीनारायण की आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम किया।