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Women's Day 2022: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष, साधना द्वारा आत्म तेज जागृत करना ही सशक्तिकरण 

Mon, 07 Mar 2022 02:07 PM IST
विनोद शुक्ला श्री शंभू गवारे,सनातन संस्था

सार

Women's Day 2022: हिन्दू धर्म ने महिलाओं को कभी भी अन्य पंथियों समान उपभोग की वस्तु नहीं माना। इसके विपरीत हिन्दू धर्म ने नारी को आदिमाया शक्ति का रूप माना है। विवाह के उपरांत कोई भी पूजा पत्नी के सहभाग के बिना पूर्ण नहीं होती। हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं के नाम भी लक्ष्मी-नारायण,सीता-राम,राधे-श्याम,गौरी-शंकर इस प्रकार हैं।
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womens day 2022: भारतीय संस्कृति में अनेक विद्वान,पराक्रमी,कुशल महिला हुईं हैं। - फोटो : Social media
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विस्तार
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गत कुछ वर्षों से स्त्री-मुक्ति अथवा महिला सशक्तिकरण विषय चर्चा में हैं। ‘महिलाओं का सशक्तिकरण’यह विषय बहुतांश बार आधुनिकीकरण अथवा पाश्चात्य एवं संस्कृति विरोधी विचारधारा के प्रभाव से चर्चा में हैं। ‘अमर्यादित स्वतंत्रता अर्थात मुक्ति’ऐसी अयोग्य संकल्पना तथा कथित आधुनिकतावादी एवं संस्कृति विरोधियों द्वारा चित्रित करने का प्रयत्न होने से आज अनेक महिलाएं, युवतियां अयोग्य मार्ग पर जा रही हैं। उन्हें खरी उन्नति के मार्ग पर लाना है,तो अयोग्य संकल्पनाओं के बंधनों को उतार फेंक, उन्हें योग्य दिशा देनी होगी। यह दिशा संस्कृति का अनुसरण एवं धर्माचरण करने के संदर्भ में है इसलिए साधना करके मिलने वाला आत्मतेज ही व्यक्ति की व्यावहारिक एवं पारलौकिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

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हिन्दू धर्म में महिलाओं का स्थान
भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर अनेक बंधन थे। वर्तमान काल में विशेष रूप से उन्हें शिक्षा मिलनी आरंभ होने पर महिलाओं को अनेक अधिकार प्राप्त हो गए़ ऐसा अपप्रचार अनेक लोगों द्वारा किया जाता है परंतु अभ्यास करने पर वस्तुस्थिति कुछ भिन्न ही है। भारतीय संस्कृति अथवा सनातन हिन्दू धर्म ने किसी पर भी अन्याय करने की कभी भी सीख नहीं दी। इसके विपरीत सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अथवा ‘सर्वे सुखिनः सन्तु’ ऐसी प्रार्थना की है। मनुस्मृति में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।’ अर्थात जिस स्थान पर नारी की पूजा होती है,वहां देवता रममाण होते हैं ऐसा कहा गया है। हिन्दू धर्म ने महिलाओं को कभी भी अन्य पंथियों समान उपभोग की वस्तु नहीं माना। इसके विपरीत हिन्दू धर्म ने नारी को आदिमाया शक्ति का रूप माना है। विवाह के उपरांत कोई भी पूजा पत्नी के सहभाग के बिना पूर्ण नहीं होती। हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं के नाम भी लक्ष्मी-नारायण,सीता-राम,राधे-श्याम,गौरी-शंकर इस प्रकार हैं। जहां स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा भी ऊंचा स्थान दिया है, वहां स्त्री-पुरुष असमानता की बात करना अर्थात स्त्रियों का अवमूल्यन करने जैसा है। महिलाओं के लिए एक दिन नहीं,अपितु प्रत्येक दिन ही हिन्दू धर्म ने दिया है। देवताओं के नाम का उच्चारण करते समय भी पहले देवी के नाम का उच्चारण,उन्हें प्रथम वंदन करने वाला धर्म अन्याय कारक है,ऐसा कहना केवल और केवल हिन्दू द्वेष है,यह ध्यान रखें।

विद्वान,शूर और कुशल महिला
भारतीय संस्कृति में अनेक विद्वान,पराक्रमी,कुशल महिला हुईं हैं। महाभारत के युद्ध में कश्मीर राजा वीरगति को प्राप्त होने पर उनकी पत्नी यशोमती का राज्याभिषेक स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। अर्जुन की एक पत्नी चित्रांगदा मणिपुर राज्य की रानी थी। राम जब वनवास को निकले,तब राजगुरु वसिष्ठ ऋषि ने सुझाव दिया था कि सीता राज्य का भार करने में कुशल और सक्षम होने के कारण उसका ही राज्याभिषेक किया जाए परंतु सीता जी ने रामजी के साथ वनवास जाने की अनुज्ञा मांगी और राज्य का भार नहीं लिया,ऐसा उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। तात्पर्य यह कि हिन्दू धर्म ने कभी भी स्त्री को वंचित नहीं रखा। पुराणों में अनेक विदूषियों के उल्लेख पाए जाते हैं। गार्गी,मैत्रेयी,लोपामुद्रा आदि विदूषी वेद-शास्त्रों में पारंगत थीं। माता कैकेयी का वर्तन कैसा भी हो,उनका राजा दशरथ के साथ युद्ध में शस्त्र उठाकर सम्मिलित होने का वर्णन पाया जाता है। वर्तमान काल का उदाहरण यदि देखना हो,तो रानी लक्ष्मीबाई युद्ध शास्त्र में पारंगत थीं। देश प्रेम से ओतप्रोत रानी ने अपने पुत्र को पीठ पर बांधकर युद्ध किया। शहाजीराजे जब कर्नाटक में थे,तब राजमाता जिजाई ने पुणे की जागीर का राज्य का भार संभाला। छत्रपति राजाराम की पत्नी रानी ताराबाई ने कोल्हापुर संस्थान स्थापित किया था। अहिल्याबाई होळकर पति निधन के उपरांत होळकर घराने की कर्ता-धर्ता हो गईं। संक्षेप में भारत को शूर-वीर एवं विद्वान नारियों की परंपरा मिली है।

इस परंपरा के अनुरूप बनना है,तो हमें स्वयं में गुणों का विकासकर,अपनी त्रुटियों पर एवं स्वयं को कम देखना,इस दोष पर मात करनी चाहिए। छोटे और तंग पाश्चात्य कपडे अर्थात आधुनिकता, अंग्रेजी बोलने का अर्थ आधुनिकता नहीं। ऐसी अंधश्रद्धा को उखाड फेंकना चाहिए। स्वेच्छाचार समान बातों का त्याग करना चाहिए। स्वतंत्रता एवं स्वेच्छाचार में भेद है। उसे समझना चाहिए। कुटुंब व्यवस्था भारत का बल स्थान है। महिला कुटुंब व्यवस्था का आधारस्तंभ है। यह आधार स्तंभ जितना सुदृढ होगा, उतनी कुटुंब व्यवस्था सुदृढ रहेगी। स्त्रियां सांस्कृतिक मूल्यों को अधिक मात्रा में संजोती हैं। आज जग भर के लोग भी ‘बैक टु मदरहुड’कहते हुए कुटुंब व्यवस्था संजोने का प्रयत्न कर रहे हैं। हमें भी शालीनता,सुसंस्कृतपना टिकाए रखने का संस्कार करना चाहिए।

असुरक्षित महिला
आज देश की परिस्थिति का यदि विचार करें,तो महिला असुरक्षित है। जिस देश में एक महिला की शील रक्षा के विषय पर रामायण,महाभारत हो जाता है,उस देश में आज प्रतिदिन सैकडों महिला अत्याचार की बलि चढ़ रही हैं। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019 में भारत में महिलाओं पर हिंसाचार के संदर्भ में 4.05 लाख घटनाओं की प्रविष्टी हुई। इसमें 30 प्रतिशत घटनाएं घरेलू हिंसाचार की हैं, तो 8 प्रतिशत घटनाएं बलात्कार की हैं। ‘ऑक्सफेम’ इस जागतिक विश्लेषण संस्था के अनुसार भारत में प्रत्येक 15 मिनट में एक लडकी का बलात्कार होता है। देश में वर्ष 2018 में बलात्कार के 34 सहस्र घटनाएं प्रविष्ट हुई थीं। 85 प्रतिशत प्रकरण में आरोप निश्चित हुए,परंतु दंड केवल 27 प्रतिशत लोगों को ही हो पाया,ऐसा ब्योरे में कहा गया है। धर्म शिक्षा के अभाव में अनेक हिन्दू युवतियां आज ‘लवजिहाद’की शिकार हो रही हैं।

रामराज्य में महिला मध्यरात्रि आभूषण पहनकर अकेले जा सकती थी। आज वैसी स्थिति नहीं है इसलिए कि आज रामराज्य नहीं। छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में भी महिलाओं को बुरी नजर से देखने वालों के हाथ-पैर तोड दिए जाते थे। आज तुरंत शिक्षा होना तो दूर,पीडित महिला को रिपोर्ट लिखवाने में भी कठिनाई आती है। यह वास्तविकता है। केवल कठोर कानून बनाकर यह स्थिति नहीं बदली जा सकती,अपितु उसके लिए विविध स्तरों पर प्रयत्न करना होगा।
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शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक सक्षमता
महिलाओं को खरे अर्थ में सक्षम बनाना हो,तो शारीरिक,मानसिक एवं आध्यात्मिक,ऐसे 3 स्तरों पर उपाय करने होंगे। प्रसिद्धि पाने के लिए स्टंटबाजी करने हेतु गर्भगृह में घुसने से महिलाओं का सक्षमीकरण नहीं होता,यह ध्यान में रखना चाहिए। महिलाओं को शारीरिक स्तर पर सक्षम बनाने के लिए उन्हें स्वसंरक्षण प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए । विद्यालय एवं महाविद्यालयीन स्तर पर उसके लिए प्रयत्न हो सकते हैं, परंतु केवल शारीरिक सक्षमता ही पर्याप्त नहीं। प्रसंगों का सामना करने के लिए मनोबल एवं आत्मबल आवश्यक होता है। यह बल साधना एवं धर्माचरण से ही प्राप्त हो सकता है। आज अनेक लोग,यहां तक की विवाहित महिलाओं को भी माथे पर लाल गोल कुमकुम लगाने में लाज आती है। आधुनिकता के नाम पर पारंपरिक भारतीय पहनावा छोड़कर छोटे-छोटे कपडे़ पहनते हैं। इस प्रकार उच्छृंखल बर्ताव से मनोबल एवं आत्मबल प्राप्त नहीं हो सकेगा,अपितु यह बल प्राप्त करने के लिए साधना ही करनी पड़ेगी। भक्ति एवं साधना का बल होने के कारण ही संत मीराबाई पर प्राणघातक संकट आए,तब भी श्रीकृष्ण ने उनकी अद्भुत ढंग से रक्षा की। भक्ति में भी शक्ति है,यह ध्यान में रखकर अपनी भावभक्ति बढानी चाहिए। कोरोना की महामारी के उपरांत आज संपूर्ण जगत आशा से हिन्दू धर्म की ओर देख रहा है और हिन्दुओं के आचार धर्म को आत्मसात कर रहा है। हमें भी अभिमान से धर्माचरण कर,धर्मशक्ति की प्रचीति लेनी चाहिए । ‘साधना द्वारा आत्मतेज जागृत करना’, यह खरा सशक्तिकरण है,यह ध्यान में रखना चाहिए। 

संकलक : श्री. शंभू गवारे ,सनातन संस्था
संपर्क :  9011088535
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