श्री गणेश मंदिर टेकड़ी में पूजा की गई
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घर में कोई भी शुभ कार्य हो या फिर शादी, सबसे पहले प्रथम पूज्य गणेश जी महाराज को भक्तों द्वारा निमंत्रण पत्र भेजा जाता है। इतना ही नहीं परेशानी होने पर उसे दूर करने की अरदास भक्त यहाँ पत्र भेजकर लगाते हैं। नित्य प्रति हज़ारों की संख्या में निमंत्रण पत्र और चिट्ठियां यहाँ डाक से पहुँचती हैं, जिन्हें पुजारी बड़ी श्रृद्धा से गणेशजी की प्रतिमा के सामने पढ़कर सुनाते है। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना अवश्य पूरी होती है। भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को यहां मेला आयोजित होता है जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु अपनी हाज़िरी लगाते हैं। इस दौरान पूरा वातावरण गजानन जी महाराज के जयकारों से गूँज उठता है। भगवान त्रिनेत्र की परिक्रमा सात किलोमीटर की है जिसे भक्त नाचते-गाते हुए जयकारों के साथ पूरी करते है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता तो बस देखते ही बनती है ,बारिश के मौसम में यहाँ पहाड़ियों में कई जगह बरसाती झरने बहने लगते हैं,जिससे यहाँ का माहौल और भी रमणीय हो जाता है।
रणथम्भौर त्रिनेत्र गणेश को लेकर यहां के लोगों में कई प्रकार की किवदंतियां प्रचलित है। स्थानीय लोगों का मानना है कि भगवान शिव ने जब गणेशजी की बाल्य अवस्था में उनका शीश काटा था तो उनका शीश यहाँ आकर गिरा था, तब से ही यहाँ भगवान गणेश के बालरूप की पूजा की जाती है। एक और मान्यता के अनुसार द्वापर युग में लीलाधारी श्री कृष्ण का विवाह रुक्मणी से हुआ था, विवाह में वे गणेशजी को बुलाना भूल गए। गणेशजी के वाहन मूषकों ने कृष्ण के रथ के आगे-पीछे सब जगह खोद दिया। श्री कृष्ण को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने गणेशजी को मनाया। जहां पर कृष्ण जी ने गणेशजी को मनाया वह स्थान रणथंभौर था। यही कारण है कि रणथम्भौर गणेश को भारत का प्रथम गणेश कहते है। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान राम ने अपनी सेना सहित लंका प्रस्थान से पहले गणेशजी के इसी रूप का अभिषेक किया था। ये भी माना जाता है कि विक्रमादित्य भी हर बुधवार को यहां पूजा करने आते थे।