उत्तर प्रदेश के वृंदावन में स्थित बांके बिहारी का मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। यहां भगवान बांके बिहारी की मात्र एक झलक पाने और अपनी मनोकामनओं की पूर्ति के लिए देश-विदेश से हर दिन हजारों की संख्या में भक्त आते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति यहां पर बांके बिहारी के दर्शन और पूजा करता है उसका जीवन सफल हो जाता है। शास्त्रों में वृंदावन की भूमि को देव भूमि भी कहा गया है। यहां के भूमि की मिट्टी को माथे पर लगाने मात्र से भक्तों का जीवन सफल, सुखमय और शांति से गुजरता है। यहां के कण-कण में राधा-कृष्ण के प्रेम की ध्वनि सुनाई देती है। वृंदावन में कई मंदिर हैं। जिनकी अपनी एक कहानी है। वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर इन्हीं में से एक है। आइए जानते हैं बांके बिहारी मंदिर का महत्व और दर्शन-पूजा के लाभ...
बांके बिहारी मंदिर
यह मंदिर वृंदावन में मौजूद सभी मंदिरों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय और मनोकानओं को पूरा करने वाला मंदिर है। भगवान कृष्ण के इस मंदिर का नाम बांके होने के पीछे उनके तीन कोणों पर मुड़ा कर बांसुरी बजाते हुए अद्भुत छवि है। इस मंदिर का निर्माण सन 1860 में हुआ था। बांके बिहारी की बांसुरी बजाते हुए मुद्रा की यह छवि उनके अनन्य भक्त स्वामी हरिदास ने निधि वन में खोजा था।
ऐसे प्रगट हुए थे बांके बिहारी
प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है। इस मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की प्रतिमा है। मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात् श्री कृष्ण और राधा समाए हुए हैं। इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा कृष्ण के दर्शन का फल मिल जाता है। प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और अद्भुत है।
स्वामी हरिदास जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने संगीत को भगवान को समर्पित कर दिया था। वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे। कान्हा की भक्त में डूबकर स्वामी हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को दुलार करने लगते।
एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं। इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे
'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।'
श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।
साल में एक बार ही होते हैं विग्रह चरणों के दर्शन
वैशाख माह की तृतीया तिथि पर जिसे अक्षय तृतीया कहा जाता है उस दिन पूरे एक साल में सिर्फ इसी दिन बांके बिहारी के चरणों के दर्शन होते हैं। इन मंदिर में भारी भीड़ जुटती है। इस दिन भगवान के चरणों के दर्शन बहुत शुभ फलदायी होता है।
दर्शन और पूजा के लाभ
मान्यता है जो भक्त बांके बिहारी के दर्शन करता है वह उन्हीं का हो जाता है। भगवान के दर्शन और पूजा करने से व्यक्ति के सभी संकट मिट जाते हैं और उसका मन कृष्ण लीला में रम जाता है। इनकी पूजा में उनका श्रृंगार विधिवत किया जाता है। उन्हें भोग में माखन, मिश्री,केसर, चंदन और गुलाब जल चढ़ाया जाता है। बांके बिहारी के स्वरूप में आधा राधा का स्वरूप और आधा कृष्ण का।