पितरों का श्राद्ध कौन कर सकता है?
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि पितृ श्राद्ध को सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों में से एक माना जाता है और इसे किसी भी कारण से रोका नहीं जाना चाहिए। गरुड़ पुराण के अनुसार, परिवार में हर बच्चा यानी पुत्र हो या पुत्री, पितरों का श्राद्ध करते हैं। यानि कि अगर किसी के माता-पिता धरती छोड़कर पितरों के लोक में चले जाते हैं तो ऐसी स्थिति में उस माता-पिता की संतान यानी बेटा हो या बेटी, माता-पिता का श्राद्ध या तर्पण अवश्य करें। क्योंकि दोनों बच्चे अपने माता-पिता का हिस्सा हैं, दोनों का अपना खून है जो उन्हें एक जनजाति के रूप में एकजुट करता है।
क्या कन्या कर सकती है तर्पण?
गरुड़ पुराण के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का पुत्र नहीं है तो उसकी पुत्री भी उसका श्राद्ध या तर्पण कर सकती है। इसके अलावा, बेटी बेटे को जन्म देने के बाद भी अपने पूर्वजों या मृत माता-पिता को तर्पण दे सकती है। इसका मतलब यह है कि दो बच्चे अलग-अलग स्थानों पर श्राद्ध कर सकते हैं। इससे कोई नुकसान नहीं होता। पितर अपने पुत्र, पुत्रियों तथा पौत्रों द्वारा किये गये श्राद्ध कर्म को अवश्य स्वीकार करते हैं। बेटियां भी परिवार का हिस्सा हैं, इसलिए अपने पूर्वजों की आत्मा की रक्षा के लिए धार्मिक अनुष्ठान करना उनका कर्तव्य है।
विवाहित पुत्रियां भी कर सकती हैं श्राद्ध और तर्पण
कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या एक विवाहित लड़की अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी या अन्य पूर्वजों को तर्पण दे सकती है? गरुड़ पुराण में कहा गया है कि विवाहित लड़कियां भी अपने पूर्वजों को "तर्पण" दे सकती हैं क्योंकि दूसरे कुल में विवाह के बाद भी उनका अपने कुल के साथ संबंध बना रहता है। लड़कियां परिवार का हिस्सा हैं और उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रहेगी। इस स्थिति में भी जो लोग लड़कियों के माता-पिता हैं उन्हें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।