गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान, दान के साथ पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, श्राद्ध का महत्व वायु पुराण, शंख स्मृति, देवी पुराण, पद्म पुराण, स्मृति रत्नावलि आदि अनेक प्रमाणित ग्रंथों में वर्णित है। पिता के गोत्र के चौबीस, माता के गोत्र के बीस, पत्नी के गोत्र के सोलह, बहन के गोत्र के बारह, पुत्री के गोत्र के ग्यारह, बुआ के गोत्र में दस तथा मौसी के गोत्र में आठ कुल, इस प्रकार एक सौ एक कुलों का तीर्थ श्राद्ध से उद्धार होता है। अन्य स्थलों पर श्राद्ध आदि कार्यों में पितरों का आह्वान करना होता है, परंतु तीर्थ में तो पुत्र आदि के आगमन पर पितृगण श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान आदि ग्रहण करने के लिए स्वत: उपस्थित हो जाते हैं।
धर्मशास्त्रों के अनुसार, जो आज हमारे सामने हैं, कल मृत्यु के बाद पितृ हो जाते हैं। हिंदू धर्म में पितृपक्ष वह समय होता है, जब पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए विशेष श्राद्ध आदि अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। इस दौरान पुत्र-पौत्र आदि गंगा आदि तीर्थ क्षेत्रों में जाकर पिंडदान एवं तर्पण करते हैं, जिससे उनके पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। ‘श्राद्धं वा पितयज्ञ: स्यात्’ यानी पितृयज्ञ का दूसरा नाम ही श्राद्ध है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, चंद्रमा की ऊर्ध्व कक्षा में पितृ लोक है, जहां पितर रहते हैं। तैतरीय उपनिषद के अनुसार, पितृ लोक पृथ्वी लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। पुण्य बल की ऊर्जा, दान-पुण्य कर्म का फल, श्राद्ध पक्ष में सूक्ष्म अंशों में पितरों को प्राप्त होता है।
संगम में तर्पण
- प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, संगम तट पर पितृ तर्पण करते समय व्यक्ति को जलधारा के मध्य में इस तरह खड़ा होना चाहिए कि पवित्र नदियों के जल का स्तर नाभि को छू जाए।
- यह संभव न होने पर संगम के किनारे बैठकर तर्पण करें।
- तर्पण देते समय पितरों का स्मरण अवश्य करना चाहिए।
- पितरों को अर्पित करने वाले जल में काले तिल, अक्षत, फूल आदि मिलाने चाहिए।
- फिर तर्पण करने के बाद दाहिने हाथ से संगम का पवित्र जल छूकर आशीर्वाद लें।
- पितरों के निमित्त अन्न, जल, वस्त्र आदि का दान संगम के अक्षय क्षेत्र में अवश्य करें, ताकि आपको पुण्य फल और पितरों को मुक्ति मिल सके।
- मान्यता है कि संगम तट पर किए गए धार्मिक अनुष्ठानों से उन आत्माओं को भी शांति मिलती है, जो अनजाने या अधूरे कर्मों के कारण तृप्त नहीं हो पाई हैं।
गंगा जल से पितृ तर्पण
महाभारत में उल्लिखित है कि गंगा जी के पास जाकर उनके जल से देवताओं और पितरों का तर्पण करना चाहिए। मान्यता के अनुसार, गंगा नदी के पवित्र तट पर किए गए श्राद्ध, तर्पण और अन्य पितृ कर्मकांड से पितरों को शांति एवं मुक्ति मिलती है। गंगा को मोक्षदायिनी कहा गया है, इसलिए पितृपक्ष के दौरान गंगा तट पर पूर्वजों के निमित्त अनुष्ठान करने से पितृ तृप्त होते हैं और उनकी आत्मा को मोक्ष मिलता है। पितरों की आत्मा की शांति व्यक्ति के जीवन में शुभता और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। देवताओं से पहले पितरों का प्रसन्न होना सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।