किस तिथि को किसका करें श्राद्ध
किसी भी माह की जिस भी तिथि में परिजन की मृत्यु हुई हो, श्राद्धपक्ष में भी उसी तिथि में उस पितृ का श्राद्ध करना चाहिए। कुछ खास तिथियां भी हैं जिनमें किसी भी प्रकार से मृत हुए परिजन का श्राद्ध किया जाता है। सौभाग्यवती अर्थात पति के रहते ही जिस महिला की मृत्यु हो गयी हो, उनका श्राद्ध नवमी तिथि (मातृ नवमी) में किया जाता है। ऐसी स्त्री जो मृत्यु को तो प्राप्त हो चुकी किन्तु उनकी तिथि नहीं पता हो तो उनका भी श्राद्ध मातृनवमी को ही करने का विधान है। सभी वैष्णव सन्यासियों का श्राद्ध एकादशी में किया जाता है जबकि शस्त्रघात, आत्म हत्या, विष, और दुर्घटना आदि से मृत लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है। सर्पदंश, ब्राह्मण श्राप, वज्रघात, अग्नि से जले हुए, दंतप्रहार से, हिंसक पशु के आक्रमण से, फांसी लगाकर मृत्य, कोरोना जैसी महामारी, क्षय रोग, हैजा आदि किसी भी तरह की महामारी से, डाकुओं के मारे जाने से हुई मृत्यु वाले प्राणी श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्दशी और अमावस्या के दिन करना चाहिए। जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो उनका भी अमावस्या को ही करना चाहिए।
तिल और कुश से करें श्राद्ध-तर्पण
सभी पितृ लोकों के स्वामी भगवान जनार्दन के ही शरीर के पसीने से तिल की और रोम से कुश की उत्पत्ति हुई है इसलिए तर्पण और अर्घ्य के समय तिल और कुश का प्रयोग करना चाहिए। श्राद्ध में ब्राह्मण भोज का सबसे पुण्यदायी समय कुतप, दिन का आठवां मुहूर्त 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक का समय सबसे उत्तम है। शास्त्र कहते हैं कि 'श्राद्धं न कुरुते मोहात तस्य रक्तं पिबन्ति ते। अर्थात जो श्राद्ध नहीं करते उनके पितृ उनका ही रक्तपान करते हैं पश्च्यात साथ ही पितरस्तस्य शापं दत्वा प्रयान्ति च। अतः अमावस्या तक प्रतीक्षा करके अपने परिजनको श्राप देकर पितृलोक चले जाते हैं। अपने पितरों के प्रति श्रद्धा रखना भी श्राद्ध की श्रेणी में आता है अतः जो श्रद्धा से दें वही श्राद्ध है।