श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है पितृऋण, वेदशास्त्र द्वारा अनुमोदित व विज्ञान सम्मत भी है श्राद्ध कर्म। श्रद्धा से किया जाए वही श्राद्ध है। 20 सितंबर को पूर्णिमा से प्रारंभ तो 6 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या। 7 सितम्बर को कोई श्राद्ध नहीं होगा।
17 दिनों के सोलह श्राद्ध, सर्वार्थसिद्धि योग से प्रारंभ और गजछाया योग में समापन। सौ वर्षों में बना ऐसा पितृ कृपा का संयोग। यज्ञों के समान है सोलह श्राद्ध इसमें पितरों को दिया भोजन अक्षय हो जाता है। श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है पितृऋण, वेदशास्त्र द्वारा अनुमोदित व विज्ञान सम्मत भी है श्राद्ध कर्म। श्रद्धा से किया जाए वही श्राद्ध है। 20 सितंबर को पूर्णिमा से प्रारंभ तो 6 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या। 7 सितम्बर को कोई श्राद्ध नहीं होगा।
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आश्विन कृष्ण पक्ष पितृपक्ष के नाम से प्रसिद्ध है। भाद्र शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या पर्यंत सोलह दिन सोलह श्राद्ध के नाम से जाने जाते है। इस वर्ष सोलह श्राद्ध सत्रह दिनों के है। 20 सितम्बर सोमवार को पूर्णिमा तिथि से सोलह श्राद्ध प्रारम्भ हो गए हैं। अतः पूर्णिमा के श्राद्ध के साथ ही जो 6 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या तक रहेंगे। ये सोलह दिन पितरों के ऋण चुकाने के दिन है। पितृ पक्ष में परिजनों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध व तर्पण करने से उनकी तृप्ति होती है और ये वर्ष पर्यंत प्रसन्न रहते है।
आचार्य शर्मा वैदिक के अनुसार इस वर्ष 26 सितंबर को कोई श्राद्ध कर्म नहीं होगा। 21 सितम्बर को प्रतिपदा से श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ होंगे। 27 को षष्ठी तिथि तो शेष आगे अमावस्या तक तिथियां क्रमशः ही रहेगी। धर्मशास्त्रीय मतानुसार श्राद्ध का समय अपरान्ह काल होता है और इस समय पितृ द्वार पर आते हैं। वायु पुराण के अनुसार इन सोलह दिनों में जो भोज्य पदार्थ आदिदिया जाता है वह अमृत रूप होकर पितरों को प्राप्त होता है।
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श्राद्ध में श्रद्धा, शुद्धता व पवित्रता जरूरी
पितृ पक्ष पितरों का आलय है। पितृ पक्ष में पितर पितृलोक से मनुष्य लोक में आशा लेकर आते हैं और यह देखते है कि उनके परिजन उनकी तिथि पर श्राद्ध कर्म करते हैं अथवा नहीं। ऐसा वे अमावस्या तक देखते हैं। जो पितरों की तिथि अथवा अमावस्या पर श्राद्ध कर्म करते हैं वे उन्हें आशीर्वाद प्रदान कर चले जाते हैं। यह पक्ष पितरों का आलय कहलाता है। यह समय उनका सामूहिक पर्व भी माना जाता है। मान्यता के अनुसार यह कर्म मध्यान्ह के बाद अपरान्ह काल में सम्पन्न होता है। 20 सितम्बर को पूर्णिमा अपरान्ह व्यापिनी है अतः सोमवार से पार्वण, महालय, प्रोष्ठ पदी पूर्णिमा श्राद्ध शुरू होंगे। भाद्र पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष के सभी श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं। अपरान्ह व्यापिनी तिथि ही श्राद्ध कर्म का सही समय है जो निरंतर सोलह दिनों तक चलेंगे।
श्राद्ध पक्ष की तिथियां इस प्रकार रहेंगी
20 सितम्बर को प्रतिपदा, 21 को द्वितीया, 22 को तृतीया। 23 को चतुर्थी, 25 को पंचम ( कुंवारा पंचमी,,,भरणी श्राद्ध ),26 और 27 को षष्ठी, 28 को सप्तमी, 29 को अष्टमी, 30 को नवमी( अविधवा नवमी ), 1 अक्टूबर को दशमी, 2 को एकादशी, 3 द्वादशी( सन्यासियों का श्राद्ध ) 4 को त्रयोदशी ,5 को चतुर्दशी (शस्त्रादिहत श्राद्ध) व 6 अक्टूबर बुधवार को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध गजछाया योग में होगा।
जिन्हें अपने परिजनों की मृत्यु तिथि नहीं है उनके निमित्त अथवा ज्ञात अज्ञात पितरों के निमित्त अमावस्या को श्राद्ध व तर्पण कर सकते हैं। पितृ पक्ष पितरों के लिए पर्व का समय है अतः इस पक्ष में श्राद्ध किया जाना चाहिए। इनकी कृपा से ही सुख और समृद्धि बनी रहती है। इस वर्ष अधिक मातामह श्राद्ध नाना-नानी का पितृ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 7 अक्तूबर, गुरुवार को होगा। इस प्रकार इन सत्रह दिनों में सोलह श्राद्ध होंगे।
श्राद्ध में तीन चीजें अत्यंत पवित्र
श्राद्ध में ये तीन चीजें अत्यंत पवित्र माने जाते है। पुत्री का पुत्र अर्थात दौहित्र, कुतप समय, अर्थात अपरान्ह समय व तिल। श्राद्ध कर्म में ये तीन पवित्र माने गए हैं। सामान्यतः श्राद्ध कर्म में कभी क्रोध व जल्दबाजी नहीं करना चाहिए। शांति, प्रसन्नता व श्रद्धा पूर्वक किया कर्म ही पितरों को प्राप्त होता है। धर्मशास्त्रीय ग्रंथ सिद्धान्त शिरोमणि व अथर्वेद का मानना है कि श्राद्ध कर्म हमारे वेद शास्त्रों द्वारा अनुमोदित व विज्ञान सम्मत भी है। आचार्य पण्डित रामचन्द्र शर्मा वैदिक के अनुसार कन्यागत सूर्य में जो भोज्य सामग्री पितरों को दी जाती है वे समस्त स्वर्ग प्रदान करने वाली कही गयी है। पितृ पक्ष के ये सोलह दिन यज्ञों के समान है इस काल में अपने पितरों की मृत्यु तिथि पर दिया गया भोजनादि पदार्थ अक्षय होता है अतः इस काल में श्राद्ध ,तर्पण, दान, पुण्य आदि अवश्य करना चाहिए। इससे आयु, पुत्र, यश,कीर्ति, समृद्धि, बल, श्री, सुख, धन, धान्य की प्राप्ति होती है।