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हिंदू धर्म में कितने तरह के होते हैं संस्कार और क्या होता है महत्व

Wed, 04 Dec 2019 03:05 PM IST
योगेश जोशी धर्म डेस्क, अमर उजाला
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संस्कारों का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व होता है
संस्कारों का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक कहीं तरह के संस्कार किए जाते हैं। हिंदू धर्म में सभी संस्कार जरूरी होते हैं। कुल 16 तरह के संस्कारों का शास्त्रों में वर्णन है। कुछ संस्कार जन्म से पूर्व ही कर लिए जाते हैं और कुछ जन्म के समय पर और कुछ बाद में किए जाते हैं। अब आपको बताते हैं कौन-से हैं वे 16 संस्कार...

 




 
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मनचाही संतान के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है
गर्भाधान संस्कार
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार मनचाही संतान के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है।
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गर्भ में पल रहे शिशु की सुरक्षा के लिए पुंसवन संस्कार किया जाता है - फोटो : pexels.com
पुंसवन संस्कार
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार गर्भधारण के दो-तीन महीने बाद किया जाने वाला संस्कार पुंसवन संस्कार कहलाता है। गर्भ में पल रहे शिशु की सुरक्षा के लिए यह संस्कार किया जाता है।

 

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सीमन्तोन्नयन संस्कार गर्भ की शुद्धि के लिए किया जाता है
सीमन्तोन्नयन संस्कार
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है। यह संस्कार गर्भ की शुद्धि के लिए किया जाता है। 
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शिशु का जन्म होते ही जातकर्म संस्कार करने का विधान है
जातकर्म संस्कार
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शिशु का जन्म होते ही जातकर्म संस्कार करने का विधान है।
 
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जन्म के बाद 11वें या 16वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है
नामकरण संस्कार
जन्म के बाद 11वें या 16वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिषय आधार पर बच्चे का नाम रखा जाता है। 
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शिशु के जन्म के चौथे चा छठे महीने में निष्क्रमण संस्कार किया जाता है
निष्क्रमण संस्कार
निष्क्रमण संस्कार शिशु के जन्म के चौथे चा छठे महीने में किया जाता है। सूर्य तथा चंद्रमा आदि देवताओं की पूजा कर शिशु को उनके दर्शन कराना इस संस्कार की मुख्य प्रक्रिया है। 

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जन्म के 6 महीने बाद बच्चे को अन्न खिलाया जाता है
अन्नप्राशन संस्कार
जन्म के 6 महीने बाद बच्चे को अन्न खिलाया जाता है। इस संस्कार को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है। 

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तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं
मुंडन संस्कार
शिशु की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं। इस क्रिया को मुंडन संस्कार कहा जाता है।
 

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कर्णवेधन संस्कार के अंतर्गत शिशु के कान छेदें जाते हैं
कर्णवेधन संस्कार
इस परंपरा के अंतर्गत शिशु के कान छेदें जाते हैं। इसलिए इसे कर्णवेधन संस्कार कहा जाता है। 

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जनेऊ धारण करना उपनयन संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।
उपनयन संस्कार
इस संस्कार को व्रतादेश व यज्ञोपवित संस्कार भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस संस्कार के द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का दूसरा जन्म होता है। विधिवत् जनेऊ धारण करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।

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विद्यारंभ संस्कार के अंतर्गत शिक्षा प्रारंभ की जाती है
विद्यारंभ संस्कार
इस संस्कार के अंतर्गत शिक्षा प्रारंभ की जाती है। इस संस्कार का मूल उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना है।

 

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पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद केशांत संस्कार किया जाता है
केशांत संस्कार
पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद गुरुकुल में ही केशांत संस्कार किया जाता है।

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पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद जातक गुरु की आज्ञा से अपने घर लौटता है
समावर्तन संस्कार
समावर्तन का अर्थ है फिर से लौटना। पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद जातक गुरु की आज्ञा से अपने घर लौटता है। इसीलिए इसे समावर्तन संस्कार कहा जाता है। 

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सनातन धर्म में विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना गया है - फोटो : social media
विवाह संस्कार
सनातन धर्म में विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना गया है। विवाह का मतलब है पुरुष द्वारा स्त्री को विशेष रूप से अपने घर ले जाना। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी से व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्त होता है।

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विवाह संस्कार में होम आदि क्रियाएं की जाती हैं
विवाह अग्नि संस्कार
विवाह संस्कार में होम आदि क्रियाएं जिस अग्नि में की जाती हैं, उसे विवाह के बाद वर-वधू अपने घर में लाकर किसी पवित्र स्थान पर स्थापित करते हैं और प्रतिदिन अपने कुल की परंपरा के अनुसार सुबह-शाम हवन करते हैं।
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अंत्येष्टि संस्कार को पितृमेध, अन्त्यकर्म व श्मशानकर्म आदि भी कहा जाता है
अंत्येष्टि संस्कार
अंत्येष्टि को इसलिए संस्कार कहा गया है कि इसके माध्यम से मृत शरीर नष्ट होता है। अंत्येष्टि संस्कार को पितृमेध, अन्त्यकर्म व श्मशानकर्म आदि भी कहा जाता है।
 
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