आज गौरी पूजन है। गौरी पूजन हेतु विवाहित महिलाएं आज के दिन अपने घर की सुख-समृद्धि और सौभाग्य प्राप्ति के व्रत रखती हैं। यह गौरी पूजन मां गौरा पार्वती से आशीर्वाद पाने के लिए रखा जाता है। यह व्रत प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि को रखा जाता है। गौरी पूजन में महिलाएं माता पार्वती की आराधना करती हैं। मुख्य रूप से गौरी पूजन का पर्व महाराष्ट्र में मनाया जाता है। गौरी पूजन हर साल गणेश चतुर्थी के चौथें व पांचवें दिन पड़ती है। इस दिन देवी का आवाहन किया जाता है। उनकी प्रतिष्ठा की जाती है। दूसरे दिन मां की मुख्य पूजा होती है और तीसरे दिन देवी की विदाई होती है।
गौरी पूजन विधि
गौरी पूजन में सबसे पहले गणपति महाराज का पूजन करें।
गणेश जी को सबसे पहल गंगाजल से स्नान कराएं।
पंचामृत से फिर दोबारा गंगाजल से स्नान कराकर साफ कपड़े से पोछकर उन्हें आसन पर रखें।
इसके बाद मां गौरी को आपके घर आने और आसन पर विराजमान होने के लिए उनका आवाहन करें।
अब वस्त्र अर्पण कर उन्हें धूप-दीप दिखाएं और फूल-माल, प्रसाद व दक्षिणा चढ़ाएं।
पूजन के समय ॐ गौर्ये नम: व ॐ पार्वत्यै नम: मंत्र का जाप करें।
गौरी पूजन व्रत कथा
शास्त्रों में गौरी पूजन को लेकर एक कथा का वर्णन है। कहते हैं इसी चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मां गौरा पार्वती और भगवान शिव भ्रमण के लिए निकले थे। भ्रमण के दौरान वे एक गांव में पहुंचें। गांववासियों को जब उनके आगमन की खबर हुई तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। जो संपन्न परिवार की महिलाएं थीं वे शिव-पार्वती के स्वागत के लिए तरह-तरह के पकवान मिष्ठान, फल आदि का इंतजाम करने लगीं। वहीं जो गरीब परिवारों की महिलाएं भी अपनी क्षमता के अनुसार जो कुछ उनसे बन पड़ा उसे लेकर अपने आराध्य देवी-देवता के स्वागत के लिए आईं। उनकी श्रद्धा को देखकर मां गौरा अति प्रसन्न हुईं और उन्होंने आशीर्वाद के रूप में सौभाग्य रस का अमृत उन पर छिड़क दिया। उसके बाद संपन्न परिवारों महिलाएं भी अपनी छप्पन भोग की थाली के साथ पधारीं। परंतु उन्हें आशीर्वाद के रूप में देने के लिए मां गौरा देवी के पास कुछ न था। ऐसे में उन्होंने अपनी उंगली काटी और उनके ऊपर अपने खून के छींटें छि़ड़क दिए।