ब्रह्मदत्त के मन में विचार आया कि तीर्थयात्रा पर निकला जाए। लेकिन छोटे भाई की विकलांगता आड़े आ रही थी। चलने-फिरने से लाचार उस अपंग भाई को वह किसके भरोसे छोड़े? यही सोच उसे खाए जा रही थी। उसने आखिर रास्ता निकाल लिया। सोचा कि उस भाई को भी कंधे पर या कांवर में बिठाकर तीर्थ पर साथ ले जाया जाए।
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दोनों भाइयों ने यात्रा शुरू की। मैदानी इलाकों की यात्रा तो किसी तरह हो गई, पर पहाड़ी रास्तों पर कठिनाई थी। पसीने से लथपथ उसकी सांस चढ़ गईं। रास्ते में ब्रह्मदत्त ने देखा कि दस-बारह साल की एक लड़की अपने छोटे भाई को कंधे पर लिए बड़े मजे से चढ़ रही है। वह पसीने से लथपथ थकी-सी लग रही थी।
ब्रह्मदत्त अपने भाई को कंधे से उतार कर उसके पास गया और बोला, बेटी, तू बहुत थक गई होगी। कितना बोझ लेकर चल रही है। सुनकर लड़की असहज हुई और बोली, श्रीमान जी, बोझ आपने लिया हुआ होगा। मैं तो अपने छोटे भाई को साथ लेकर जा रही हूं। वह कोई बोझ नहीं है। छोटा भाई भी बोझ होता है भला?
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सुनकर ब्रह्मदत्त विस्मित से ज्यादा शर्मिंदा हुआ। उसे ग्लानि हुई कि लड़की से उसने कह कैसे दिया कि बोझ से थक रही होगी। पश्चाताप होते ही उसे अपने अपंग भाई का ख्याल आया। उसे लेकर चलते हुए जो थकान महसूस हो रही थी, वह काफूर हो गई।
ब्रह्मदत्त को विचार आया कि यह तो मेरा भाई ही है। परिवार का अंग है। यह एहसास होते ही उसका वजन फूल की तरह लगने लगा। प्रसंग सुनाते हुए गुरु ने कहा कि प्रेम और सेवा का सुख पाना हो, तो मेहनत का मूल्य चुकाना ही पड़ेगा। जहां कहीं भी आत्मीयता जुड़ जाती है, श्रम थकाता नहीं, बल्कि स्फूर्ति देता है।