स्वामी रामतीर्थ का नाम तीर्थ राम था। वह बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। धन्ना भगत नामक एक संत के सान्निध्य में आकर उन्होंने धर्मशास्त्रों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई की और एम ए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद स्यालकोट के मिशन कॉलेज तथा लाहौर के कॉलेज में शिक्षण कार्य भी किया।
एक दिन वह लाहौर में आयोजित सत्संग में श्रीरामकथा सुन रहे थे। श्रीराम की लीला का वर्णन सुनते ही अचानक वह रो पड़े और बोले, प्यारे राम, मुझ दीन पर दया करो। क्या मैं किष्किंधा के वानरों से भी गया बीता हूं, जिन्होंने अपना समय आपके बीच बैठकर बिताया? क्या मैं शबरी जी के बराबर भी सौभाग्यशाली नहीं हूं, जिनके जूठे बेर आपने खाए? उन्होंने तत्क्षण शरीर की सुध-बुध खोकर संकल्प लिया, अब यह शरीर मेरा नहीं, परमात्मा का है।
वर्ष 1897 में दीपावली के दिन तीर्थ राम संन्यास लेकर रामतीर्थ बन गए। उन्होंने अपने पिता गोस्वामी हीरानंद जी को पत्र लिखा, आज का दिन दीवाली का है। मैं भी जुआ खेलने बैठा हूं और अपना जीवन दांव पर लगाकर उसे ईश्वर के लिए समर्पित कर चुका हूं।
स्वामी रामतीर्थ ने अमेरिका और ब्रिटेन में जाकर सनातन धर्म का प्रचार कर भक्ति-भागीरथी प्रवाहित की। उन्होंने भारतीय संस्कृति का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।