जैन संत आचार्य तुलसी कहते थे कि किसी भी तरह की आसक्ति या महत्वाकांक्षा से सर्वथा मुक्त रहने में ही कल्याण है। एक दिन उन्होंने एक कथा सुनाई- एक महात्मा की घोर तपस्या से उनके आश्रम में सिंह और बकरी, सर्प और मेढ़क तक बैर भाव भुलाकर प्रेम के साथ रहने लगे। इंद्र को लगा कि यदि महात्मा की तपस्या चलती रही, तो उनका आसन अधिक दिन तक नहीं टिक पाएगा। उन्होंने महात्मा को आसक्ति से डिगाने का उपाय सोचा।
एक दिन वेश बदलकर वह आश्रम पहुंच गए और महात्मा से कहा, महाराज, मैं कहीं बाहर जा रहा हूं। यह तलवार आपके पास छोड़े जा रहा हूं। यदि इसका ध्यान रख सकें, तो आभारी रहूंगा। संत ने स्वीकृति दे दी।
महात्मा जी ने सोचा कि तलवार किसी की धरोहर है, इसलिए उसे अपने पास रखने लगे। जहां जाते तलवार साथ ले जाते, ताकि उसे कोई चुरा न ले। ईश्वर में हर समय लीन रहनेवाला मन अकसर तलवार की ओर चला जाता। इस तरह संत की साधना का क्रम भंग होने लगा। साधना में विघ्न पड़ने से आश्रम का सात्विक वातावरण दूषित होने लगा और जो जीव हिंसा त्यागकर मैत्री के कारण साथ-साथ रहते थे, वे फिर एक-दूसरे का भक्षण करने लगे।
आचार्य तुलसी यह कथा सुनाकर कहते थे, किसी भी वस्तु के प्रति आसक्ति जीवन भर की तपस्या नष्ट कर देती है, इसलिए इससे बचना चाहिए।