महान भागवताचार्य स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज कर्णवास (उत्तर प्रदेश) में गंगातट पर आश्रम में ठहरे हुए थे। एक जिज्ञासु एक दिन उनके पास पहुंचा। उसने विनम्रता से पूछा, महाराज, मोक्ष का साधन बताने की कृपा करें।
स्वामी जी ने कहा, इसके लिए पहले यह जानना जरूरी है कि किस बंधन से हम मोक्ष चाहते हैं, क्योंकि हर व्यक्ति अलग-अलग तरह के बंधनों में जकड़ा हुआ है।
जिज्ञासु को समझाते हुए स्वामी जी ने आगे कहा, आदमी पग-पग पर राग, मोह, लिप्सा, नासमझी, अहंकार आदि न जाने कितने बंधनों से जकड़ा रहता है। उसे यह महसूस नहीं होता कि ये बंधन मुक्त करने के बजाय उसे और सख्ती से जकड़ रहे हैं। हम सांसारिक सुख-सुविधाओं की आकांक्षा में ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करने का प्रयास करते हैं। यह खुद को बंधन में जकड़ने का प्रयास ही तो है।
अज्ञान और सुख सुविधा भी तो बंधन ही हैं। अपने को दूसरों से बड़ा समझने और दूसरों को नीचा समझने का भ्रम- ये सब बंधन ही तो हैं। सबसे बड़ा बंधन तो अहंकार होता है। जिस व्यक्ति ने इसका त्याग कर दिया, समझो कि वह मुक्ति का रास्ता पा चुका है।
स्वामी जी ने कुछ देर रुककर कहा, मानव शरीर की जगह आत्मा का महत्व जिस दिन समझ जाएगा, वह ब्रह्मज्ञानी हो जाएगा। ब्रह्मज्ञान प्राप्त होते ही उसके समस्त बंधन स्वतः कट जाएंगे।