स्वामी रामकृष्ण परमहंस का मूल मंत्र था, प्रत्येक प्राणी में आत्मा स्वरूप ईश्वर विद्यमान है। यदि किसी प्राणी की सेवा करोगे, तो साक्षात ईश्वर की सेवा का पुण्य प्राप्त होगा। यदि किसी को दुख पहुंचाओगे, तो ईश्वर के प्रकोप को सहन करना ही पड़ेगा।
उन दिनों बाल विवाह की प्रथा थी। स्वामी रामकृष्ण का विवाह भी 1860 में छह वर्षीया शारदा देवी के साथ कर दिया गया। कुछ वर्ष बाद उन्हें उनकी ससुराल भेजा गया। पत्नी को देखते ही परमहंस को जगदंबा के दर्शन हुए। उनके मुख से सहज ही निकला, हे सर्वशक्तिमान त्रिपुर सुंदरी, तुम साक्षात शारदा हो, सरस्वती हो।
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गरीबों और असहायों की सेवा-कल्याण का साधन बनकर अपना तथा मेरा जीवन सफल बनाने को संकल्प लो। शारदा देवी पति के शब्द सुनकर अभिभूत हो उठीं और उन्होंने उसी दिन अपना सर्वस्व सेवा-परोपकार के लिए समर्पित करने का संकल्प ले लिया।
स्वामी अचलानंद जी ने श्री शारदा देवी सुप्रभातम में लिखा है, मां शारदा ने जीवों के दुख से दुखित होकर अपना जीवन प्राणियों की सेवा-सहायता में लगाया। असंख्य भक्त उनका दर्शन कर जीवन में अनूठी शांति प्राप्त करते हैं।
शारदा मां ने अपने अंतिम प्रवचन में कहा था, यदि स्वयं शांति चाहते हो, तो दूसरों को सुख-शांति दो। न किसी का दोष देखो और न किसी की निंदा करो। रामकृष्ण परमहंस की तरह वह भी हर क्षण काली मां के ध्यान में मग्न रहती थीं।