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Sita Navami: सीता नवमी आज, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, महत्व और मां सीता के जन्म की कथा

Thu, 16 May 2024 06:32 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Maa Janaki Navami: सीता नवमी पर विशेष रूप से माता सीता की उपासना करने से व्यक्ति को विशेष लाभ मिलता है। साथ ही जीवन में आ रही सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। मान्यता है इस दिन मां सीता की विधि विधान से पूजा करने पर आर्थिक तंगी दूर होती है और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है
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सीता नवमी 2024 - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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Kab Hai Sita Navami: आज वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है। आज सीता नवमी मनाई जाएगी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता सीता इसी दिन धरती से प्रकट हुई थीं। इसीलिए इस दिन को सीता जयंती या सीता नवमी के रूप में मनाते हैं। इसको जानकी नवमी के नाम से भी जाना जाता है। सीता नवमी पर विशेष रूप से माता सीता की उपासना करने से व्यक्ति को विशेष लाभ मिलता है। साथ ही जीवन में आ रही सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। मान्यता है इस दिन मां सीता की विधि विधान से पूजा करने पर आर्थिक तंगी दूर होती है और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए जानते हैं सीता नवमी की तिथि, मुहूर्त , महत्व और कथा। 

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सीता नवमी की तिथि 
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का आरंभ:
16 मई ,गुरुवार, प्रातः 6:22 से 
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का समाप्त:17 मई, शुक्रवार, प्रातः 08:48 

सीता नवमी का शुभ मुहूर्त 
सीता नवमी का मध्याह्न मुहूर्त: प्रातः11.04 से दोपहर 01:43 तक 
सीता नवमी का मध्यान क्षण 12: 23 तक है। 

सीता नवमी का महत्व
सीता नवमी का दिन राम नवमी की तरह ही शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो राम-सीता का विधि विधान से पूजन करता है, उसे 16 महान दानों का फल, पृथ्वी दान का फल तथा समस्त तीर्थों के दर्शन का फल मिल जाता है। वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि पाने के लिए सीता नवमी का श्रेष्ठ माना गया है। सीता नवमी के दिन माता सीता को श्रृंगार की सभी सामग्री अर्पित की जाती हैं। साथ ही इस दिन सुहागिनें व्रत रखकर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। 

माता सीता के जन्म की कथा
वाल्मिकी रामायण के अनुसार एक बार मिथिला में भयंकर सूखा पड़ा था जिस वजह से राजा जनक बेहद परेशान हो गए थे।  इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्हें एक ऋषि ने यज्ञ करने और  खुद धरती पर हल चलाने का सुझाव दिया। राजा जनक ने अपनी प्रजा के लिए यज्ञ करवाया और फिर धरती पर हल चलाने लगे। तभी उनका हल धरती के अंदर किसी वस्तु से टकराया। मिट्टी हटाने पर उन्हें वहां सोने की डलिया में मिट्टी में लिपटी एक सुंदर कन्या मिली। जैसे ही राजा जनक सीता जी को अपने हाथ से उठाया, वैसे ही तेज बारिश शुरू हो गई। राजा जनक ने उस कन्या का नाम सीता रखा और उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। 
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