चतुर्थी तिथि के देव के रूप में सुखकर्ता श्री गणेश सर्वत्र पूजे जाते हैं। संतानों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली संकष्टी गणेशचतुर्थी का व्रत माघ कृष्णपक्ष चतुर्थी को मनाया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी, तिलकुटा चौथ या माघी चौथ भी कहते हैं। हिन्दू धर्म में स्त्रियों के ऐसे अनेक व्रत और त्योहार होते हैं, जिनमें दिनभर उपवास के बाद रात्रि में जब चंद्रमा उदय हो जाता है, तब चंद्रदेव को अर्घ्य देकर और पूजा करके ही अन्न-जल ग्रहण किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत महिलाएं अपने परिवार के स्वास्थ्य व दीर्घायु होने की मंगल कामना से करती हैं।
इसलिए दिया जाता है चंद्रमा को अर्घ्य
शास्त्रों में वर्णित है कि सौभाग्य, पुत्र, धन-धान्य, पति की रक्षा एवं संकट टालने के लिए चंद्रमा की पूजा की जाती है। संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा की पूजा का एक अन्य कारण यह भी है कि चंद्रमा औषधियों और मन के अधिपति देवता हैं। उसकी अमृत वर्षा करने वाली किरणें वनस्पतियों और मनुष्य के मन पर सर्वाधिक प्रभाव डालती हैं। दिन भर उपवास के बाद चतुर्थी के चंद्रमा को जब महिलाएं देखती हैं,तो उनके मन एवं शरीर पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है,उनके मुख व शरीर पर एक विशेष कांति आ जाती है। इससे महिलाओं का यौवन अक्षय,स्वास्थ्य उत्तम और दांपत्य जीवन सुखद हो जाता है। उपनिषद के अनुसार जो व्यक्ति चंद्रमा में पुरुषरूपी ब्रह्म को जानकार उसकी उपासना करता है,वह उज्जवल जीवन व्यतीत करता है। उसके सारे कष्ट दूर होकर सभी पाप नष्ट हो जाते हैं एवं वह लंबी आयु पाता है।
चंद्रदेव की कृपा से उपासकों की इस लोक और परलोक में रक्षा होती है।ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है,जो मन की चंचलता को नियंत्रित करता है। हमारे शरीर में दोनों भौहों के मध्य मस्तक पर चंद्रमा का स्थान माना गया है। यहां पर महिलाऐं बिंदी या रोली का टीका लगती हैं,जो चंद्रमा को प्रसन्न कर मन का नियंत्रण करती हैं।भगवान शिव के मस्तक पर अर्धचंद्र की उपस्थिति उनके योगी स्वरुप को प्रकट करती है। अर्धचंद्र को आशा का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।चंद्रमा को अर्घ्य देने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है।
इस दिन दान का महत्व
मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न तिल और माता लक्ष्मी के द्वारा प्रकट किए गन्ने के रस से बने गुड का तिलकुटा बनाकर उसे दान करना चाहिए। व्रत करने वालों के लिए यदि संभव हो तो दस महादान जिनमें अन्नदान, नमक का दान, गुड का दान, स्वर्ण दान,तिल का दान, वस्त्र का दान, गौघृत का दान, रत्नों का दान, चांदी का दान और दसवां शक्कर का दान करें। ऐसा करके प्राणी दुःख-दरिद्र,कर्ज, रोग और अपमान के विष से मुक्ति पा सकता है। इस दिन गाय और हाथी को गुड खिलाने से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। विधार्थी इस दिन 'ॐ गं गणपतये नमः' का 108 बार जप करके प्रखर बुद्धि और उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। 'ॐ एक दन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात' का जप जीवन के सभी संकटों और कार्य बाधाओं को दूर करेगा।
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