आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना किसने की?
आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना अगस्त्य ऋषि ने राम-रावण युद्ध के समय राम की विजय प्राप्त के लिए की थी। वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के पांचवे सर्ग में आदित्य हृदय स्तोत्र की महिमा का वर्णन विस्तार से किया गया है।
भगवान राम का आदित्य हृदय स्तोत्र से संबंध
वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम-रावण युद्ध क्षेत्र में आमने सामने थे और कई प्रयासों के बाद भी श्री राम रावण का वध नहीं कर पा रहे थे। श्री राम का आत्मविश्वास रावण की तामसी शक्ति के सामने समग्र भाव से एकजुट नहीं हो पा रहा था तब युद्धक्षेत्र में प्रभु राम के समक्ष ऋषि अगस्त्य प्रकट हुए। अगस्त्य ऋषि ने युद्धक्षेत्र में राम से सूर्य देव की स्तुति करने को कहा।
अगस्त्य ऋषि ने भगवान राम से युद्ध भूमि में कहा सबके हृदय में वास करने वाले राम! यह अति गोपनीय स्तोत्र सुनों। वत्स ! इसके पाठ मात्र से रावण समेत युद्ध में सभी शत्रुओं का विनाश होगा और उन्हें विजय की प्राप्ति होगी।
यह परम कल्याण का स्तोत्र है। इसके पाठ से सब पापों का नाश हो जाता है। भगवान सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं। सूर्य सम्पूर्ण देवता का स्वरूप हैं। इनका तेज सम्पूर्ण जग को स्फूर्ति परदान करने वाला है। ये अपनी रश्मि किरणों से सम्पूर्ण लोक का पालन करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चंद्रमा, वरुण, पितृम वसु, साध्य, अश्वनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को सभी लोक के समक्ष प्रकट करने वाले प्रभा के पुंज हैं।
अगस्त्य ऋषि आगे कहते हैं, हे राघव! विपत्ति में, कष्ट में, शत्रु के सामने, किसी भय के सामने, दुर्गम मार्ग में जो भी पुरुष सूर्य देव के आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करेगा। उसे दु:ख नहीं भोगना पड़ेगा। इसीलिए हे राम ! एकाग्रचित होकर आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करो। इसका तीन बार जेपी करो, युद्ध में विजय पाओगे।
यह कहकर ऋषि अगस्त्य युद्ध क्षेत्र से चले गए। श्री राम ने प्रसन्न होकर शुद्ध हृदय से आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ किया। उस समय आकाश में विद्यमान भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर राम की ओर देखा और कहा, हे रघुनन्दन! तुम्हारे द्वारा की गई रावण वध की मनोकामना जल्द ही पूर्ण होगी। उसके बाद महापराक्रमी रघुनाथ ने धनुष उठाकर रावण को युद्ध का आमंत्रण दिया। इसके बाद राम ने रावण का वध करके पाप और अहंकार का नाश किया।
आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ की विधि
- सूर्यादय से पूर्व स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- एक तांबे के लोटे में जल लेकर रोली या चंदन और पुष्प डालकर प्रात: सूर्य को अर्पित करें।
- सूर्य को जल देते समय गायत्री मंत्र का जाप करें और वहीं सूर्यदेव के समक्ष आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।
- प्रयास करें कि इस पाठ को शुक्ल पक्ष के किसी रविवार से प्रारंभ करें। ऐसा करना उत्तम माना गया है।
- आदित्य हृदय स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन सूर्योदय के समय इसका पाठ करना चाहिए।
आदित्य हृदय स्तोत्र के लाभ
- ग्रहों के राजा भगवान सूर्य देव को समर्पित आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। चेहरे पर अलग ही चमक दिखाई देती हैं।