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Raksha Bandhan 2021: क्यों मनाया जाता है रक्षाबंधन का त्योहार? जानिए इस पर्व को मनाने के पीछे की पौराणिक कथाएं

Wed, 18 Aug 2021 11:33 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद

सार

  • 22 अगस्त, रविवार को पूरे देश में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाएगा। इस पर्व को भाई-बहन के प्रेम और सदभाव के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है, इसके बदले में भाई बहन को भेंट देता है एवं सदैव उसकी रक्षा करने का वचन भी देता है।
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रक्षाबंधन 2021: अच्छे मुहूर्त अथवा भद्रारहित काल में भाई की कलाई में राखी बांधने से भाई को कार्य सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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22 अगस्त, रविवार को पूरे देश में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाएगा। इस पर्व को भाई-बहन के प्रेम और सदभाव के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है, इसके बदले में भाई बहन को भेंट देता है एवं सदैव उसकी रक्षा करने का वचन भी देता है। अच्छे मुहूर्त अथवा भद्रारहित काल में भाई की कलाई में राखी बांधने से भाई को कार्य सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। लेकिन रक्षाबंधन के त्योहार से जुड़ी बहुत सी मान्यताएं और पौराणिक कथाएं हैं इन्हीं मान्यताओं के आधार पर राखी का त्योहार मनाया जाता है।

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जब लक्ष्मीजी ने राजा बलि को बनाया भाई
शास्त्रों के अनुसार असुरों के राजा बलि ने अपने बल और पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। राजा बलि के इस पराक्रम को देख स्वर्ग के राजा इंद्रदेव घबरा गए और भगवान विष्णु के पास मदद मांगने पहुंचे। इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। वामन भगवान ने दानवीर बलि से तीन पग भूमि मांगी। अपने पहले और दूसरे पग में भगवान ने धरती और आकाश नाप लिया। इसके बाद तीसरा पग रखने के लिए कुछ बचा नहीं तो राजा बलि ने तीसरा पग अपने सिर पर रखने के लिए कहा। भगवान वामन ने ऐसा ही किया। इस तरह देवताओं की दुबिधा समाप्त हो गई और साथ ही भगवान राजा बलि के इस दान से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि से वरदान मांगने को कहा तो बलि ने उनसे पाताल में बसने का वर मांग लिया। राजा की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान विष्णु को पाताल जाना पड़ा। इस वजह से सभी देवतागण और माता लक्ष्मी चिंतित हो गए। अपने पति को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी ने गरीब स्त्री का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंच गईं और उन्हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी। इसके बदले उन्होंने भगवान विष्णु को पाताल लोक से ले जाने का वचन मांग लिया। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी और माना जाता है कि तभी से रक्षाबंधन मनाया जाने लगा है।

रक्षासूत्र से देवताओं को मिली विजय
भविष्य पुराण के अनुसार एक बार देवता और दानवों में 12 साल तक युद्ध हुआ लेकिन देवता जीत नहीं पाए। इंद्र देव अपनी हार के डर से दुखी होकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए। उनके सुझाव पर इंद्र की पत्नी महारानी शची ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन विधि-विधान के साथ व्रत करके रक्षा सूत्र तैयार किए। इसके बाद उन्होंने इंद्र की दाहिनी कलाई में रक्षा सूत्र बांधा और समस्त देवताओं की दानवों पर विजय हुई। तभी से विजयकामना हेतु रक्षासूत्र बांधने की परंपरा शुरू हुई।  
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द्रौपदी ने कृष्णजी को बांधी पट्टी
शास्त्रों में कृष्ण और द्रौपदी का एक वृत्तांत मिलता है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी अंगुली में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उसे उनकी अंगुली पर पट्टी की तरह बांध दिया। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। श्रीकृष्ण ने बाद में द्रौपदी के चीर-हरण के समय उनकी लाज बचाकर भाई का धर्म निभाया था।

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