1. श्राद्ध कर्म और तर्पण
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म और तर्पण करना पितरों को संतुष्ट करने का मुख्य उपाय माना जाता है। श्राद्ध कर्म में पितरों को अर्पित भोजन, जल और तर्पण किया जाता है। हर दिन या विशेष तिथियों पर यह कर्म करने से पितर प्रसन्न होते हैं। तर्पण के दौरान गंगाजल, दूध, काले तिल और जौ का उपयोग किया जाता है और इसे किसी पवित्र नदी या जलाशय में अर्पित किया जाता है। अगर संभव हो तो पवित्र स्थान पर जाकर पिंडदान करना भी अत्यधिक लाभकारी माना जाता है।
2. भोजन और दान
पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, गाय, कौआ,चींटी और कुत्ते को भोजन देना भी पुण्यदायी होता है। विशेषकर गाय को भोजन कराना अत्यधिक फलदायी होता है । ब्राह्मणों को भोजन के साथ-साथ दक्षिणा और वस्त्र दान करने से भी पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
3. धार्मिक पाठ और मंत्र जाप
पितरों की कृपा पाने के लिए धार्मिक पाठ और मंत्रों का जाप करना विशेष रूप से फलदायी होता है। खासकर, 'पितृ सूक्त' का पाठ और 'ॐ पितृभ्यः नमः' मंत्र का जाप करने से पितर संतुष्ट होते हैं। इसके अलावा 'गायत्री मंत्र' का जाप भी पितरों की कृपा पाने का एक प्रभावी उपाय है। पवित्र धूप और दीप जलाकर पितरों के नाम से यह कार्य करना चाहिए।
4. कपड़े और वस्त्रों का दान
पितरों की कृपा पाने के लिए जरूरतमंद लोगों को वस्त्र, कपड़े, जूते और छाता का दान करना लाभकारी होता है। पितृपक्ष में किए गए ऐसे दान से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। इसके साथ-साथ अन्न, जल और फल भी दान करना चाहिए।
5. वृक्षों की पूजा
मत्स्य पुराण में वनस्पति तंत्र का उल्लेख है अर्थात पितरों के निमित्त अनुकूलता के लिए वृक्षों को सींचें साथ ही इस दौरान पौधे रोपें।यह करने से भी पितरों की तृप्ति होती है। क्यों कि पितरों की ऊर्जा वनस्पति में भी पाई जाती है।इनको सींचने से मन शांत रहता है,बुद्धि प्रबल होती है और रोग-दोष का निवारण होता है।इसलिए अपने जीवन काल में हर व्यक्ति को कम से कम 12 या 15 पौधे लगाने चाहिए।उनको सींचना चाहिए।