मान्यता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भगवान विश्वनाथ काशी के राजा हैं और काल भैरव इस नगर के कोतवाल माने जाते हैं। इसी कारण से इन्हें काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। इनके दर्शन किये बिना बाबा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है। इसलिए विश्वनाथ के दर्शन कर कालभैरव के दर्शन करना चाहिए। ब्रह्मवैवर्तपुराण में महाभैरव, संहारभैरव, असितांगभैरव, रुद्रभैरव, कालभैरव, क्रोधभैरव, ताम्रचूड़भैरव तथा चंद्रचूड़भैरव इन्हीं आठ भैरवों की उपासना का विधान बताया गया है। लेकिन वर्तमान में सभी जगह श्रीबटुक एवं श्रीकालभैरव की पूजा-आराधना सर्वाधिक की जाती है। बटुक भैरव जो भक्तों को अभय देने वाले सौम्य और सात्विक रूप में प्रसिद्ध है तो वहीं काल भैरव आपराधिक प्रवृतियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचंड दंडनायक है। ये अपने भक्तों को तत्काल सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति प्रदान करते हैं। इनकी पूजा या इनका स्मरण करने से भी घर में नकारात्मक ऊर्जा, जादू-टोने तथा भूत-प्रेत आदि से किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता है।
फलदायी है इनकी उपासना
शास्त्रों की मान्यता के अनुसार भगवान काल भैरव की उपासना कभी भी की जा सकती है। लेकिन विशेष रूप से कालाष्टमी के दिन विधिवत रूप से कालभैरव की पूजा करने से जल्दी ही शुभ फल मिलते है। शिवपुराण में इनकी महिमा का गुणगान करते हुए नंदीश्वर ने भी कहा है कि- 'जो मनुष्य कालभैरव के संनिकट उपवास करके रात्रि में जागरण करता है,वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। प्राणियों के लाखों जन्मों में किए हुए जो पाप हैं, वे सब के सब कालभैरव के दर्शन से मिट जाते हैं। जो मूर्ख लोग कालभैरव के भक्तों का अनिष्ट करता है,वह इस जन्म में दुःख भोगकर पुनः दुर्गति को प्राप्त होता है। जो लोग विश्वनाथ के तो भक्त हैं परन्तु कालभैरव की भक्ति नहीं करते,उन्हें महान दुःख की प्राप्ति होती है।' मान्यता है कि काल भी इनसे भयभीत रहता है इसलिए इन्हें काल भैरव एवं हाथ में त्रिशूल,तलवार और डंडा होने के कारण इन्हें दंडपाणि भी कहा गया है। इनकी पूजा करने से नकारात्मक शक्तियों,बुरी आत्माओं और जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिलती है। वहीं भगवान कालभैरव को न्याय और धर्म का संरक्षक माना जाता है। इनकी उपासना से भक्तों को हर क्षेत्र में विजय मिलती है और वह धर्म के मार्ग पर चलता है।
ऐसे करें प्रसन्न
कालाष्टमी पर भगवान शिव के अंश कालभैरव की पूजा करना विशेष फलदाई है। इस दिन प्रातः स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर भगवान कालभैरव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद काल भैरव के साथ शिव परिवार की पूजा करें। काल भैरव को हल्दी या कुमकुम का तिलक लगाकर इमरती, पान, नारियल आदि चीजों का भोग लगाएं। इसके बाद सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाकर आरती करें। रात के समय काल भैरव के मंदिर जाकर धूप, दीपक जलाने के साथ काली उड़द, सरसों के तेल से पूजा करने के बाद भैरव चालीसा, शिव चालीसा व कालभैरवाष्टक का पाठ करें। कालिका पुराण के अनुसार भैरव जी का वाहन श्वान है इसलिए इस दिन काले कुत्ते को मीठी चीजें खिलाने से भैरव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देते है।