योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्मदिन 'जन्माष्टमी' का पर्व आज बड़े उत्साह के साथ मनाया जाएगा। अक्सर देखा गया है कि, यह पर्व दो दिनों-तिथियों में मनाया जाता रहा है। बहुत कम ऐसा अवसर आता है कि गृहस्थ और वैष्णव संन्यासियों का ये पावन पर्व एक साथ मने। स्मृति ग्रंथों के अनुसार योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, मध्य रात्रि, वृषभ लग्न और बुधवार के दिन हुआ था इसमें कोई मतभेद अथवा विवाद कभी नहीं रहा। इनमें से अधिकांश योग इस वर्ष 06 सितंबर बुधवार को विद्यमान भी हैं इसलिए देश के कई भागों में यह पर्व इसी दिन मनाया जाएगा।
देश के जिस भागमें सूर्योदय कालीन तिथि को वरीयता दी जाती है वहाँ और वैष्णव सम्प्रदाय तथा सन्यासियों द्वारा यह पर्व07सितंबर गुरुवार को सूर्योदयकालीन अष्टमी तिथि के दिन मनाया जायेगा क्योंकि ये भक्त अष्टमी और नवमी तिथि के संधिकाल को ही वरीयता देते हैं। इस वर्ष रात्रि में नवमी (रिक्ता तिथि) व्याप्त होगी। शास्त्रों में रिक्ता तिथि में किया गया कार्य बहुत शुभ नहीं माना जाता किंतु उसदिन यदि शनिवार हो तो ये शुभ होता है और न हो, तो कार्यसिद्धि के लिए शनि की होरा का समय ग्रहण किया जा सकता है। ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण के जन्म के समय मध्य रात्रि में वसुदेव जी जब इन्हें लेकर मथुरा से गोकुल के लिए प्रस्थान किए तो उनके गोकुल पहुंचने तक 'ब्रह्ममुहूर्त' लग चुका था इसलिए वृंदावन गोकुल आदि के भक्त उदयातिथि की अष्टमी को ही जन्माष्टमी मानते हैं।
इन मंत्रों के जप से पाएं ईष्ट फल-
पूजन-पार्थना के लिए- ॐ क्लीं कृष्णाय नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ अच्युतानंत गोविंदाय नमः।
गृहक्लेश से मुक्ति का मंत्र- ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमोऽ नम:।|
अच्छे स्वास्थ्य का मंत्र- अच्युतानन्त गोविंद नामोच्चारण भेषजात्। नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।|
पेट संबंधी विकार से मुक्ति का मंत्र- अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापान समायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।|
उत्तम संतान प्राप्ति का मंत्र- ॐ क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणंगतः।।
कृष्ण के साथ देवी-देवता भी व्रज में
व्रज क्षेत्र की महिमा अपरंपार है चाहे वृंदावन हो, मथुरा हो, गोकुल हो, बरसाना हो अथवा यहाँ के अन्य क्षेत्र हों भक्ति हमेशा यहाँ नृत्य करती रहती है। भगवान कृष्ण की आराधना के प्रति यहां के प्राणियों में अलग उत्साह रहता है। इस उत्साह के पीछे एक गोपनीय रहस्य है जो इस प्रकार है। सच्चिदानंदस्वरूप भगवान श्रीमहाविष्णु को श्रीराम के रूप में देखकर वनवासी और मुनिलोग विस्मित हुए और कहने लगे कि प्रभु हम सभी आपका आलिंगन करना चाहते हैं। तब भगवान बोले ! अन्य जन्म में तो नहीं किंतु, कृष्णावतार में आप सब गोप और गोपिकाएं बनकर मेरा आलिंगन करेंगे। तब सभी ऋषि मुनि बोले कि प्रभु हमारे अन्य अवतारों में भी आप हमें वह गोप-गोपियां ही रखें और हमें स्त्रियां ही बना दें ताकि हम आपका रमणीय स्पर्श कर सकें। रूद्रादि सभी देवों-देवियों, ऋषियों-मुनियों का यह वचन सुनकर स्वयं श्रीमहाविष्णु ने कहा, आपका वचन मानकर मैं आप सभीके साथ गोप रूपमें आलिंगन और गोपिकाओं के साथ महारास करूंगा। इस प्रकार श्रीमहाविष्णु के कृष्णावतार लेने पर सभी देवी-देवता अनेक रूप धारणकरके पृथ्वी पर आए।
देवलोकवासी व्रज में-
भगवान् श्रीकृष्ण का संकेत पाकर सभी देवी-देवता जब व्रज में पधारे तो इनमें परमानंद नंदबाबा के रूपमें, मुक्ति देवी माँ यशोदा के रूपमें, ब्रह्मविद्या देवकी के रूपमें तथा वेद वसुदेव के रूप में जन्म लिए। गोपियां और गायें वेद की ऋचाएं हैं। ब्रह्मा कृष्ण की लाठी, रुद्र बांसुरी हैं। बैकुंठ गोकुल के रूपमें और वहाँ के वृक्ष तपस्वी मुनि गण हैं। गोपालकृष्ण माया द्वारा शरीर धारण किए हुए ईश्वर हैं, वह स्वयं ब्रह्म हैं। दया रोहिणी के रूप में, अहिंसा सत्यभामा के रूप में, मनोविग्रह सुदामा रूप में, सत्य अक्रूर जी के रूप में, उद्धव इन्द्रिय निग्रह के रूप में, लक्ष्मी शंख के रूप में और ऋषि कश्यप उलूखल के रूप में हैं। देवमाता अदिति रस्सी के रूप में, श्रीमहाकाली श्रीकृष्ण की गदा के रूप में, माया सारंग धनुष के रूप में, और स्वयं शक्ति तुलसीमाला के रूप में व्रज में पधारे हैं। इस प्रकार सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि सिद्ध आदि अनेक रूपों में व्रज में तपस्यारत रहते हैं तभी व्रज की परिक्रमा करने से सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा का फल मिलता है। ये सब कृष्ण से भिन्न नहीं और कृष्ण उनसे भिन्न नहीं हैं।