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Arti: आरती कीजै हनुमान लला की.. दुष्ट दलन रघुनाथ कला की, पढ़ें बजरंगबली की संपूर्ण आरती

Sat, 12 Apr 2025 06:07 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Hanuman Janmotsav 2025: हिंदू धर्म में रोजाना महावीर हनुमान की पूजा-अर्चना की जाती है। परंतु प्रभु की विशेष कृपा प्राप्ति के लिए हनुमान जन्मोत्सव  सबसे शुभ है। 
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Hanuman Janmotsav 2025 - फोटो : Adobe
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विस्तार
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Hanuman Janmotsav 2025: हिंदू धर्म में रोजाना महावीर हनुमान की पूजा-अर्चना की जाती है। परंतु प्रभु की विशेष कृपा प्राप्ति के लिए हनुमान जन्मोत्सव  सबसे शुभ है। इस दिन की गई उपासना से साधक को करियर में मनचाहे परिणामों की प्राप्ति और व्यापार में धन लाभ मिलता है। इतना ही नहीं यदि सच्चे भाव से हनुमान जी को बूंदी का भोग लगाया जाए, तो कुंडली में भी मंगल की स्थिति शुभ होती है, जिसके प्रभाव से व्यक्ति ऊर्जावान व आत्मविश्वासी बनता है।

इस बार 12 अप्रैल 2025 को हनुमान जन्मोत्सव है। यह चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है। इस दिन शनिवार होने के कारण इसे विशेष रूप से शुभ माना गया है, क्योंकि शनिवार और हनुमान जन्मोत्सव का संयोग एक दुर्लभ अवसर के समान है। इस संयोग में संकट मोचन हनुमान की उपासना-व्रत करने से शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में भी कमी आती हैं। वहीं इस संयोग में हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, सुंदरकांड आदि का पाठ करना कल्याणकारी साबित हो सकता है। हालांकि आरती करने से पूजा संपूर्ण फल प्राप्ति के योग का निर्माण होता है। ऐसे में आइए हनुमान जी की संपूर्ण आरती के बारे में जानते हैं...

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Hanuman Janmotsav 2025: घर पर करें हनुमान जी की पूजा इस आसान विधि से, मिलेगी समृद्धि और कष्टों से मुक्ति

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हनुमान जी की आरती
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।
 
जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके।।
 
अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतान के प्रभु सदा सहाई।
 
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारी सिया सुध लाए।
 
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।
 
लंका जारी असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आणि संजीवन प्राण उबारे।
 
पैठी पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े।
 
बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।
 
सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे।
 
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।
 
लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।
 
जो हनुमानजी की आरती गावै। बसी बैकुंठ परमपद पावै।
 
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।
 

हनुमान चालीसा Hanuman Chalisa

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निजमनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।


बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।


चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन वरन विराज सुवेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै। शंकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग वन्दन।।

विद्यावान गुणी अति चातुर।राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।।

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा। नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भये सब जग जाना।। जुग सहस्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना।।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै।सोई अमित जीवन फल पावै।।

चारों युग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता।। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को भावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। अन्त काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई।। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहिं बंदि महा सुख होई।।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

दोहा 
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये खबर लोक मान्यताओं पर आधारित है। इस खबर में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है
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