पंचांग के अनुसार गोपाष्टमी पर्व कार्तिक शुक्ल अष्टमी को मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस दिन से गौचारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी का दिन था। इसी दिन से गोपाष्टमी पर्व का प्रारम्भ हुआ। श्रीमदभागवत में यह उल्लेख है कि भगवान श्रीकृष्ण बाल्यावस्था में गायों संग खेला करते थे और वे गायों की सेवा भी करते थे। उन्हें गाय से बहुत प्रेम था। गोपाष्टमी पर गायों की पूजा करने से सुख-सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस दिन गाय और गाय के बछड़े की भी पूजा करनी चाहिए।
पूजा विधि
गोपाष्टमी पर गो पूजन करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। गोपाष्टमी पर सुबह गाय को शुद्ध जल से स्नान कराना चाहिए और इसके बाद फूल-माला वस्त्र पहनाकर रोली-चंदन का तिलक लगाना चाहिए। फिर गोमाता को फल, मिष्ठान, आटे व गुड़ की भेली, पकवान आदि खिलाएं और धूप-दीप जलाकर आरती करें। इस दिन गोमाता के साथ ही भगवान श्रीकृष्ण की भी पूजा करें।
पौराणिक कथा
श्रीमदभागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण जब पांच वर्ष के हो गए और छठे वर्ष में प्रवेश किया तो एक दिन यशोदा माता से बाल कृष्ण ने कहा-मइया! अब मैं बड़ा हो गया हूँ,अब मुझे गोपाल बनने की इच्छा है,मैं गोपाल बनूँ? मैं गायों की सेवा करूँ? मैं गायों की सेवा करने के लिए ही यहां आया हूँ। यशोदाजी समझाती हैं कि बेटा! शुभ मुहूर्त में मैं तुम्हें गोपाल बनाउंगी ।बातें हो ही रहीं थी कि उसी समय शाण्डिल्य ऋषि वहां आए और भगवान कृष्ण की जन्मपत्री देखकर कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गौचारण का मुहूर्त निकाला।
बालकृष्ण खुश होकर अपनी माता के ह्रदय से लग गए। झटपट माता यशोदा जी ने अपने कान्हा का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियां पहनाने लगीं तो बालकृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे-मैया! यदि मेरी गायें जूती नहीं पहनतीं तो मैं कैसे पहन सकता हूं और वे नंगे पैर ही अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ गायों को चराने वृन्दावन जाने लगे व अपने चरणों से वृन्दावन की रज को अत्यंत पावन करते हुए,आगे-आगे गौएं और उनके पीछे -पीछे, बांसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदंतर बलराम, ग्वालबाल तालवन में गौचारण लीला करने लगे।
भगवान कृष्ण का अतिप्रिय 'गोविन्द' नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पड़ा था क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गायों और ग्वालों की रक्षा के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर रखा था, आठवें दिन इंद्र अपना अहम त्यागकर भगवान कृष्ण की शरण में आए, उसके बाद इंद्र की कामधेनू गाय ने भगवान का अभिषेक किया और इंद्र ने भगवान को गोविंद कहकर सम्बोधित किया।
गोपाष्टमी तिथि और मुहूर्त
इस साल अष्टमी तिथि सोमवार 20 नवंबर को सुबह 05 बजकर 21 मिनट से शुरू हो जाएगी और मंगलवार 21 नवंबर को सुबह 03 बजकर 18 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। ऐसे में गो पूजन को समर्पित गोपाष्टमी का पर्व सोमवार 20 नवंबर को मनाया जाएगा।