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Aja Ekadashi 2023: रवि पुष्य योग में अजा एकादशी आज, जानिए महत्व, पूजाविधि और कथा

Sun, 10 Sep 2023 08:37 AM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 09 सितंबर रात्रि 07 बजकर 17 मिनट से शुरू होगी और 10 सितंबर रात्रि 09 बजकर 28 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। ऐसे में अजा एकादशी व्रत 10 सितंबर 2023, रविवार के दिन रखा जाएगा।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकदशी व्रत रखने से व्यक्ति को शारीरिक,मानसिक एवं आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Aja Ekadashi 2023: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकदशी व्रत रखने से व्यक्ति को शारीरिक,मानसिक एवं आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं। इस विशेष दिन पर भगवान विष्णु की उपासना करने से साधक को सभी पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। भाद्रपद माह की कृष्णपक्ष एकादशी का नाम अजा एकादशी है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 09 सितंबर रात्रि 07 बजकर 17 मिनट से शुरू होगी और 10 सितंबर रात्रि 09 बजकर 28 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। ऐसे में अजा एकादशी व्रत 10 सितंबर 2023, रविवार के दिन रखा जाएगा। इस विशेष दिन पर पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र का निर्माण हो रहा है। साथ ही इस दिन वरीयान योग, रवि पुष्य योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का भी निर्माण होगा, जिन्हें सभी मांगलिक कार्यों के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।

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अजा एकादशी का महत्व
पदमपुराण के अनुसार अजा एकादशी सब पापों का नाश करने वाली है।जो भगवान ऋषिकेश का पूजन करके इसका व्रत करता है,वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णुलोक में जाता है। इस व्रत का फल अश्वमेघ यज्ञ, तीर्थों में दान-स्नान, हजारों वर्षों की तपस्या, कन्यादान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होता है।

पूजाविधि
प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु का माँ लक्ष्मी के साथ गोपी चन्दन,चावल,पीले पुष्प,ऋतु फल,तिल एवं मंजरी सहित तुलसी दल से पूजन करें ।दिन भर निराहार रहते हुए शाम को फलाहार कर सकते हैं। एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यदि आप किसी कारण से व्रत नहीं कर सकते है तो इस दिन मन में विष्णु भगवान का ध्यान करते हुए सात्विक रहें ,झूठ न बोले,किसी का मन नहीं दुखाएं एवं पर निंदा से बचें । एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए।
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कथा
पौराणिक काल में एक अत्यन्त वीर, प्रतापी तथा सत्यवादी हरिश्चंद्र नाम का चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। प्रभु इच्छा से उसने अपना राज्य स्वप्न में एक ऋषि को दान कर दिया और परिस्थितिवश उन्हें अपनी स्त्री और पुत्र को भी बेच देना पड़ा। स्वयं वह एक चाण्डाल के दास बन गए।राजा ने उस चाण्डाल के यहाँ कफन लेने का काम किया, किन्तु उन्होंने इस मुश्किल काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। जब इसी प्रकार कई वर्ष बीत गये तो उन्हें अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगे।वह सदैव इसी चिन्ता में रहने लगे कि मैं क्या करूँ? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाऊँ? एक बार की बात है, वह इसी चिन्ता में बैठे थे कि गौतम् ऋषि उनके पास पहुंचे।

हरिश्चन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख-भरी कथा सुनाई। राजा हरिश्चन्द्र की दुख-भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यन्त दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा- 'हे राजन! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो तथा रात्रि को जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।' महर्षि गौतम इतना कह कर चले गये। अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चन्द्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधानपूर्वक उपवास तथा रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गये। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उन्होंने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया एवं अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र तथा आभूषणों से परिपूर्ण देखा। व्रत के प्रभाव से राजा को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हुई। वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था, परन्तु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अन्त समय में हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को चले गए।

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