आज योग दिवस है। पूरी दुनिया में योग चर्चा में है। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद की परंपरा से जुडे़ संन्यासी योगाचार्य स्वामी गौरीश्वरानंद पुरी का नाम शिमला के लिए अपरिचित नहीं। मीडिया की चमक दमक से दूर योगाचार्य पुरी अपने सीमित साधनों के साथ बरसों से योग साधना कर रहे हैं। पुरानी और नई पीढ़ी को वह योग से परिचित करा रहे हैं।
योगाचार्य का कहना है कि योग का लाभ तभी मिलता है, जब आपके जीवन में खाने-पीने और सोने-जागने का अनुशासन हो। टीवी देखकर या किताब पढ़ने से योग नहीं होता। योगासन और प्राणायाम का अभ्यास किसी सिद्ध आचार्य के सानिध्य में ही करना चाहिए। योग दिवस पर उनसे बातचीत की हमारे वरिष्ठ संवाददाता सुरेश शांडिल्य ने।
'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करता हूं'
1. देश में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की धूम है। क्या कहते हैं?
उत्तर : इसका समर्थन करता हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करता हूं। भारत के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। मोदी स्वयं एक योगी हैं। बचपन से योग का अभ्यास करते आए हैं।
2. योग को हिंदू धर्म से जोड़कर देखा जाता है और सेकुलर सोच के लोग इस दिवस को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने के खिलाफ हैं? क्या योग हिंदू धर्म का ही प्रचार-प्रसार नहीं है?
उत्तर : योग को सिर्फ हमारे शरीर से जोड़कर देखा जाना चाहिए। योग तो शरीर को दुरुस्त रखने के लिए एक उत्तम कला है। इसे किसी धर्म विशेष से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। यह संकीर्णता ही होगी। हम जब हवाई जहाज में चढ़ते हैं तो नीचे सब एक समान दिखता है। संकीर्णता ही मृत्यु है और प्रसारण ही जीवन। इसे हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मों के पैमाने पर देखना गलत होगा।
3. योग को आप कैसे परिभाषित करते हैं?
उत्तर : योग का अर्थ है जोड़ना, मिलना, प्राप्त करना। महर्षि पतंजलि के अनुसार मन की वृत्तियों को ही शांत करना योग है। योग के आठ अंग हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि। बिना हिले-डुले शरीर को एक ही स्थिति में रखना आसन है। यह निरंतर अभ्यास मांगता है।
आसनबद्ध होने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति के विच्छेद को प्राणायाम कहते हैं। संसार में जितने भी प्रकार के तप हैं, उनमें प्राणायाम सर्वश्रेष्ठ है। जीवन में तीन बातों को अगर कोई अपना ले तो वह एकदम स्वस्थ होगा। ये हैं आदर्श दिनचर्या, संतुलित भोजन और शुद्ध विचार।
एक आम आदमी कैसे करे योग
बह उठकर खाली पेट कोसा पानी पीएं। हो सके तो सूर्योदय से पहले ब्रह्ममुहूर्त में उठें। अगर ऐसा न कर सकें तो सवेरे जब भी सोकर उठें तो पहला कार्य उषापान का करें। वयस्क एक लीटर पानी में एक नींबू को निचोड़कर उसमें थोड़ा सेंधा नमक डालकर उसके रस को पीएं। बच्चा आधे लीटर पानी में आधा नींबू निचोड़कर ही पीए।
कोसे पानी में ही नींबू पीएं तो इसकी तासीर ठंडी नहीं होगी। इसके बाद शौच को जाए। अगर ठीक मोशन न बने तो विपरीतकरणी मुद्रा के आसन जैसे शलभासन, त्रिकोणासन, हस्तपादासन, योगमुद्रा आदि करें। यानी जिससे पेट पर दबाव पड़े, ऐसे आसन करें। अगर फिर भी असर न हो तो बाईं बगल में तकिया रखकर लेट जाएं और दाईं नासिका (सूर्य नाड़ी) से सांस चलाएं।
शौच क्रिया से जैसे ही निवृत्त हो जाएं तो स्नान करें। फिर सूर्य नमस्कार आसन करें। इसके कम से कम तीन राउंड करें तो सही रहेगा। इसके बाद कपालभाति क्रिया करें। कम से कम पांच मिनट तक करें। प्रत्येक राउंड में 60 स्ट्रोक होने चाहिए। एक सेकेंड में एक स्ट्रोक ठीक रहेगा। हर 60 स्ट्रोक के बाद 20 सेकेंड का गैप दें।
उसके बाद नाड़ी शोधन प्राणायाम करें। इसे सहज प्राणायाम भी कहते हैं। सीधे हाथ के अंगूठे के साथ की दो उंगलियों तर्जनी और मध्यमा को मोड़ें। फिर अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बंद करें। सांस बाएं छिद्र से भीतर खींचें। अब अनामिका एवं कनिष्ठिका से नाक के बाएं छिद्र को दबाएं। नासिका के दाएं छिद्र से अंगूठा हटाकर श्वास को इसी से वापस बाहर निकालें। फिर इसके उलट दाएं छिद्र से सांस लेकर बाएं से छोड़ें। यह एक राउंड हो गया।
सांस इतना धीमे से लें कि इसकी आवाज तक न आए। सांस को खींचना और बाहर छोड़ना इस प्रक्रिया को पूरक और रेचक कहते हैं। इसके कम से कम पांच राउंड करें। राउंड पूरे करने पर शवासन पर लेट जाएं। फिर मंत्रोच्चारण करके ईश्वर का नाम लें। अगर अन्य धर्मों से संबंधित हैं तो वे अपने आराध्य का नाम लें। जैसे अल्लाह, गॉड आदि। ये सब एक हैं। ऐसा ही अभ्यास शाम के समय भी कर सकते हैं, मगर इसके लिए पेट को हल्का रखना होगा।