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World Refugee Day 2022: तिब्बत के सामने अब भाषा और संस्कृति बचाने की चुनौती

Mon, 20 Jun 2022 12:25 PM IST
अरविन्द ठाकुर रविंद्र सिंह भड़वाल, संवाद न्यूज एजेंसी, धर्मशाला

सार

दुनिया भर में करीब डेढ़ लाख तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं। इनमें से सबसे ज्यादा करीब 90,000 भारत में हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में ही करीब 25,000 शरणार्थी रह रहे हैं।
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तेंजिन सुंदू, नामग्याल डोलकर ल्हाग्यारी। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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आजादी के लिए पिछले छह दशकों से जारी संघर्ष के बीच तिब्बत शरणार्थियों के सामने अब अपनी भाषा और संस्कृति बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। चीन ने तिब्बत में शिक्षण संस्थान तोड़ने के बाद नीतिगत स्तर पर अपने प्रयास तेज कर दिए हैं, जिससे तिब्बत में भाषायी और सांस्कृतिक पहचान को ही मिटा दिया जाए। चीन इस नई रणनीति पर काम कर रहा है, जिसमें तिब्बत की नई पीढ़ी आजादी की बात करना ही छोड़ देगी।

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हालांकि चीन की इस नीति के खिलाफ अब तिब्बतियों का प्रयास है कि चीन से भी ज्यादा तेजी से वे अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए प्रयास करेंगे, ताकि तिब्बत की आजादी का संघर्ष अपने अंजाम तक पहुंच सके। तिब्बती यहां अपनी संस्कृति और शैक्षणिक गतिविधियां बढ़ाएंगे, ताकि आने वाली पीढ़ी को इसकी जानकारी मिले। इसके अलावा तिब्बत में जो चीन के अत्याचार हो रहे हैं, उनके बारे में भी अपने बच्चों को बताएंगे। तिब्बतियों में स्वदेश न लौटने की पीड़ा बढ़ती जा रही है।

करीब छह दशक पहले चीन की ज्यादतियों ने तिब्बतियों को अपनी मातृभूमि छोड़ धर्मशाला समेत दुनिया भर के अलग-अलग हिस्सों में शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया था। विशाल हिमालय को लांघकर भारत पहुंचे तिब्बतियों की उस पीढ़ी के लोगों के जहन में तिब्बत की यादें आज भी उनके सीने को कुरेदती हैं। वहीं, उसके बाद की पीढ़ियां कल्पनाओं में अपने देश तिब्बत को जिंदा रखे हुए हैं।
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अपने देश न लौटने की पीड़ा सताती है : तेंजिन
तिब्बत की आजादी के लिए अब तक 16 बार जेल काट चुके कार्यकर्ता और साहित्यकार तेंजिन सुंदू का कहना है कि आज भी उनके मन में अपने देश में न लौट पाने की पीड़ा है। इसके लिए 2010 से चीन के साथ बंद पड़े संवाद को शुरू करना ही प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि भारत सहित दुनिया भर के देशों से मिलने वाले समर्थन के बाद हमारी तिब्बत लौटने की उम्मीद मजबूत हुई है।

अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान मजबूत करने के प्रयास होंगे : ल्हाग्यारी
तिब्बत की आजादी के लिए संघर्षरत नामग्याल डोलकर ल्हाग्यारी का कहना है कि चीन लगातार तिब्बत पर ऐसे हमले कर रहा है, जिससे हमारी मूल पहचान मिट जाए। इसके लिए हमारी भाषा को निशाने पर ले रखा है। ऐसे में हमारा प्रयास है कि अपने दुश्मन से भी ज्यादा प्रयास हम करें कि हमारी भाषा, संस्कृति और पहचान मिटने के बजाय और भी मजबूत हो।

दुनिया भर में करीब डेढ़ लाख तिब्बती शरणार्थी
दुनिया भर में करीब डेढ़ लाख तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं। इनमें से सबसे ज्यादा करीब 90,000 भारत में हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में ही करीब 25,000 शरणार्थी रह रहे हैं। यहीं से निर्वासित तिब्बत सरकार भी संचालित हो रही है।

द्विभाषी नीति से भाषायी हमला
चीन ने कुछ समय पहले तिब्बत के स्कूलों में द्विभाषी फार्मूला लागू कर दिया था। इसके तहत तिब्बत के स्कूलों में तिब्बती भाषा के अलावा चीनी भाषा सीखना अनिवार्य कर दिया गया था। पाठ्य पुस्तकों को भी चीनी भाषा में शुरू किया गया, ताकि तिब्बत की नई पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट सके। 

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