चुनाव नहीं लड़ने का एलान कर चुके मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह फैसले पर अडिग हैं। विरोधी इसे सीएम का पुत्र मोह में लिया निर्णय बता रहे हैं, लेकिन वे मानते हैं कि विक्रमादित्य सिंह राजनीति में सक्रिय हैं और खुद को स्थापित कर सकते हैं।
दिल्ली में हाईकमान से तोल-मोल की बात को उन्होंने खारिज किया है। सुक्खू को हटाए जाने पर उनका कहना है कि सही व्यक्ति सही जगह पर नहीं है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उन्होंने अंतिम निर्णय हाईकमान पर छोड़ दिया है।
वे चुनाव लड़े या नहीं, लेकिन सियासी फ्रंट में उनकी अहम भूमिका रहेगी। अमर उजाला से विशेष बातचीत में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने भविष्य की राजनीति साझा की।
आप चुनाव लड़ेंगे या नहीं ?
मुख्यमंत्री - मैं विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा। यह मेरा फैसला है। इससे हाईकमान को अवगत करवा दिया है। उनका जो आदेश होगा उसका इंतजार है। मैं हाईकमान की अनदेखी तो नहीं कर सकता। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मेरी बातों को गंभीरता से सुना है।
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आपको संन्यास का ख्याल क्यों आया ?
मुख्यमंत्री - मैं राजनीति से संन्यास नहीं ले रहा। वर्ष 1962 में 25 वर्ष की उम्र से राजनीति में हूं। कोई राजनेता सियासत नहीं छोड़ सकता है। मैं पार्टी के चुनावी कार्यक्रमों में साथ हूं। आप यह कह सकते हैं कि अब मैं एक्टिव पॉलिटिक्स नहीं करना चाहता हूं। बाकी हाईकमान के ऊपर है।
यह हाईकमान से मोल-तोल की सियासत तो नहीं ?
मुख्यमंत्री - नहीं यह कोई मोल-तोल की सियासत नहीं है। आखिर मैं क्यों ऐसा करूंगा। केंद्र में मंत्री होने के साथ कई बार मुख्यमंत्री रहा हूं। मुझे किसी बात से आपत्ति होती है तो सीधे हाईकमान से बात करता हूं।
आरोप है कि आप बेटे विक्रमादित्य का टिकट पक्का करवाना चाहते हैं?
मुख्यमंत्री - यह सरासर गलत है। विक्रमादित्य समझदार इंसान हैं। लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं। युवा कांग्रेस के निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष हैं। अगर वे टिकट मांग रहे हैं तो उनका पुख्ता आधार है। सभी लोगों को युवाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए। पार्टी का भविष्य उन्हीं पर है।
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विरोधी आप पर परिवारवाद के आरोप लगा रहे हैं?
मुख्यमंत्री - यह परिवारवाद की राजनीति नहीं है। मेरा बेटा अगर चुनाव जीत सकता है तो उसको टिकट मिलना चाहिए। कई वर्षों से वह मेहनत कर रहा है। उसे टिकट उसके काम के हिसाब से मिलेगा। अगर काम नहीं करेगा तो टिकट नहीं मिलेगा। यह परिवारवाद नहीं होता। वो पहली बार चुनाव जीतेगा और पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री या मंत्री तो बनना नहीं है। ऐसे में अगर कोई ये कहे कि अपनी राजनीति विरासत बढ़ा रहे हैं तो गलत है।
आखिर पीसीसी चीफ सुक्खू से आप इतने नाराज क्यों हैं?
मुख्यमंत्री - पीसीसी चीफ सुक्खू से मेरे कोई निजी मतभेद नहीं हैं। वे अच्छे व्यक्ति हो सकते हैं, लेकिन चुनाव के लिहाज से उपयुक्त नहीं हैं। सबको साथ लेकर नहीं चल सकते। हमारा हाईकमान से इतना कहना था कि निर्वाचित अध्यक्ष होना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं होना चाहिए। अभी भी हाईकमान अगर अध्यक्ष बदलता है तो चुनाव में बेहतर परिणाम आ सकते हैं। बतौर पीसीसी चीफ उन्हें चार वर्ष हो चुके हैं, अब किसी और को मौका देना चाहिए।
आपकी हाईकमान में सुनवाई नहीं हो रही?
आपकी हाईकमान में सुनवाई नहीं हो रही?
मुख्यमंत्री - हाईकमान के सामने अपनी बात रखने का सबको अधिकार है। मैं लगातार हाईकमान में अपनी बात रखता रहा हूं। कई बार कुछ मामलों पर निर्णय में देरी हो जाती है, लेकिन बात हमेशा सुनी जाती है। राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात सार्थक रही है। जब चुनाव होंगे तो उसमें पूरी तरह सक्रिय रहूंगा। मुझे चुनाव लड़ने के लिए आदेश मिलता है तो उसपर भी विचार किया जाएगा। मेरा मत है कि सही व्यक्ति को सही जिम्मेदारी मिलनी चाहिए।
आपके चुनाव न लड़ने से कांग्रेस को नुकसान होगा?
मुख्यमंत्री - मेरे चुनाव नहीं लड़ने का यह मतलब नहीं कि राजनीति से दूर हो जाऊंगा। पांच वर्षों में सरकार ने जनता के लिए बहुत काम किया है, उसको प्रचारित करने में पार्टी के साथ रहूंगा।
संगठन सरकार में खींचतान पर शिंदे की भूमिका क्या रही?
मुख्यमंत्री - अंबिका जी के बाद शिंदे जी को हिमाचल का प्रभार मिला है। शिंदे वरिष्ठ नेता हैं, समझदार हैं, लेकिन मुझे लगता है कि वे सिर्फ खुद को चुनाव करवाने तक सीमित रख रहे हैं। प्रदेश कांग्रेसी की अंदरूनी राजनीति में शामिल नहीं हो रहे। होना यह चाहिए कि पहले घर को ठीक करें फिर ही चुनाव में बेहतर नतीजे मिल सकते हैं।