जनजातीय क्षेत्र लाहौल घाटी की महिलाओं ने वनों को बचाने के लिए अनूठी मिसाल कायम की है। मूलिंग गांव की महिलाएं 35 साल से वनों की रक्षा कर रही हैं। यहां गांव का कोई भी व्यक्ति जंगल से सूखी लकड़ी तक नहीं ला सकता। वहीं, थिरोट गांव की महिलाएं भी इन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए एक दशक से वनों के संरक्षण के लिए अहम भूमिका निभा रही हैं। एक दशक पूर्व थिरोट महिला मंडल ने एक प्रस्ताव पारित कर निर्णय किया था कि जंगल में कोई भी व्यक्ति हरे पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाता है तो महिला मंडल पांच हजार जुर्माना लगाएगा।
इतना ही नहीं, उन लोगों का समाज से हुक्का पानी बंद कर दिया जाएगा। इस निर्णय से गांव के लोग अपने घरों में चूल्हा जलाने के लिए जंगल से सूखी लकड़ी तक नहीं ला सकते हैं। महिला मंडल की इस पहल की खूब सराहना हो रही है। यही भूमिका लाहौल का थिरोट महिला मंडल भी निभा रहा है। लाहौल घाटी में साल में चार से पांच माह छोड़कर बिना तंदूर जलाए रहना आसान नहीं है, मगर यहां की जागरूक महिलाओं की पहल से जंगल में कोई पेड़ कटान नहीं कर सकता है।
यही कारण है कि लाहौल में हरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने का एक भी मामला सामने नहीं आया है। लाहौल वन मंडलाधिकारी दिनेश शर्मा का कहना है कि लाहौल के महिला मंडल वनों के संरक्षण में अहम भूमिका निभा रहे हैं। डेढ़ दशक में घाटी में वन कटान का एक भी मामला सामने नहीं आया है। आग की घटना को रोकने के लिए भी महिलाएं हमेशा तत्पर हैं।
महिलाओं की सख्ती से हटा दिए बैरियर
लाहौल-स्पीति जिला क्षेत्रफल के लिहाज से हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है, लेकिन क्षेत्रफल में जंगलों के दायरे की बात करें तो यह एक प्रतिशत से भी कम है। तीन दशक पूर्व लाहौल घाटी में लोग सर्दियों में लकड़ी जलाने के साथ मकान आदि बनाने के लिए जंगलों पर अधिक निर्भर थे। कई तस्करी के मामले भी सामने आए। उन दिनों तिंदी और थिरोट में बाकायदा वन विभाग के बैरियर भी लगे थे। आज घाटी के महिला मंडलों की पर्यावरण संरक्षण की पहल से वन विभाग ने यह बैरियर भी हटा दिए हैं।
थिरोट महिला मंडल की प्रधान कुंती देवी ने बताया कि गांव के महिला मंडल ने एक दशक पहले वन कटान पर कड़ी पाबंदी लगा रखी है। कोई भी व्यक्ति अपनी मनमर्जी से जंगल से सूखी लकड़ी भी महिला मंडल के इजाजत के बिना नहीं ला सकता है। उल्लंघन करने पर हुक्का पानी बंद करने का प्रावधान है।
मूलिंग गांव की महिला मंडल प्रधान निर्मला देवी ने बताया कि गांव के जंगल में करीब 35 साल से सूखी लकड़ी लाने पर भी पाबंदी है। गांव का कोई भी व्यक्ति अपने घर के लिए हरे पेड़ का कटान तो दूर, सूखी लकड़ी तक नहीं ला सकता है।