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Kangra: मणिमहेश यात्रियों ने सुनाई आपबीती, चलने की स्थिति में नहीं थे, जंगलों-पगडंडियों के रास्ते पहुंचे

Sat, 30 Aug 2025 07:07 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, लंबागांव (कांगड़ा)

सार

सड़कें क्षतिग्रस्त और भूस्खलन से बंद होने के कारण पैदल चलने की स्थिति में न होने के बावजूद भी लोगों को चंबा तक का सफर करना पड़ा। 
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मणिमहेश यात्रा से लाैटे लोगों ने सुनाई आपबीती। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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मणिमहेश से कठिन परिस्थितियों के बीच लोग अब अपने-अपने घर पहुंचने लगे हैं। करीब एक सप्ताह तक रास्तों में फंसे लोग दहशत के साये में रहे। सड़कें क्षतिग्रस्त और भूस्खलन से बंद होने के कारण पैदल चलने की स्थिति में न होने के बावजूद भी लोगों को चंबा तक का सफर करना पड़ा। मोबाइल नेटवर्क न होने से परिवार से संपर्क न होने से डर की स्थिति भयावह बन गई थी। बीच में जहां सड़कें ठीक थीं, वहां स्थानीय लोगों ने अपने निजी वाहनों से यात्रियों की मदद की और खानपान की भी व्यवस्था लंगर लगाकर की।

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शनिवार दोपहर बाद राजा का तालाब पहुंचे मणिमहेश यात्रियों डिंपल शर्मा, मिताली शर्मा (भरमाड़), शुभलता (अमृतसर), रीना शर्मा (राजा का तालाब), निशा शर्मा, मुनीश शर्मा, नबी शर्मा (परोल नरनूंह) ने कहा कि ऐसी भयावह स्थिति उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी। उन्होंने कहा कि शिव घराट में 24 अगस्त को बादल फटने के बाद जब नदी में पानी के भारी सैलाब को आते देखा, तो उनके मन में डर की स्थिति पैदा हो गई। प्रशासन के दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए इसी दिन शिव घराट में ही रात गुजारने को विवश हुए।

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धनछो से आगे सुंदरासी से पहले शिव घराट में रात्रि विश्राम के बाद उन्हें मजबूरी में अधूरी यात्रा के साथ हड़सर के लिए वापसी करनी पड़ी। जगह–जगह भूस्खलन, नदी में बढ़ते जल सैलाब के बीच डर के साये में 25 अगस्त शाम तक हड़सर पहुंचे। इस दौरान और बादल फटने की घटनाएं सुनकर मन में भय पैदा हो गया। रास्ते साफ होने के इंतजार में तीन रातें भरमौर में ही काटीं। भरमौर से चंबा मार्ग में जगह-जगह भूस्खलन और सड़कें बहने से कई दिनों तक गाड़ी न मिलने की बातें सुनीं। साथ गए कुछ लोगों की चलने की स्थिति न होने के बावजूद मजबूरी में चंबा का सफर पैदल तय करने के लिए विवश होना पड़ा। संवाद
क्या बोले श्रद्धालु

मिताली शर्मा ने कहा कि भरमौर से चंबा आते हुए देखा कि कई जगह तो सड़कों का नामोनिशान नहीं था। जंगलों और पगडंडियों के सहारे रास्ता तय करना पड़ा। बीच में एक-दो किलोमीटर सड़क ठीक थी और इन स्थानों पर स्थानीय लोगों ने अपनी गाड़ियों में बिठाकर मुफ्त में सफर तय करवाने में मदद की। वहीं, राख से घर तक एचआरटीसी बस में मुफ्त में सफर किया। डिंपल शर्मा ने बताया कि जगह-जगह लंगर लगने से उन्हें खाने-पीने में कोई अधिक दिक्कत नहीं हुई। प्रशासन का सहयोग बेहतरीन रहा, जब शुक्रवार को बनीखेत में भूस्खलन से मार्ग अवरुद्ध हो गया तो बाथरी स्थित सीएचसी के कर्मचारियों ने उनकी बहुत मदद की। वहां भी लंगर व्यवस्था से उन्हें खाने के लिए कोई परेशानी नहीं हुई।

शुभ लता निवासी अमृतसर ने बताया कि कई जगह उन्हें रात गुजारने के लिए निजी रैन बसेरों में रहना पड़ा। ऐसे में पैसों का भी अभाव हो गया। ऐसा भयावह मंजर उन्होंने कभी नहीं देखा। भरमौर से राख तक लगभग 35 किलोमीटर लंबा रास्ता उन्हें जंगलों, पगडंडी से होते हुए पैदल तय करना पड़ा। बीच में एक-दो किलोमीटर में स्थानीय लोगों ने अपनी निजी गाड़ी से मुफ्त में सेवाएं दीं। स्थानीय लोगों ने जगह-जगह खाना खिलाकर उनके दिलों को जीत लिया।


 

 मणिमहेश यात्रा से सकुशल वापसी पर मां ने उतारी बेटे की आरती, बांटी मिठाई 
कांगड़ा जिले के लंबा गांव में मणिमहेश यात्रा से सकुशल वापसी पर मां ने अपने बेटे की आरती उतारी। साथ ही मिठाई भी बांटी। बेटे को सकुशल पाकर मां की आंखें नम हो गईं। सराइं मोहल्ले की नीलम देवी के बेटे ऋषभ ने जैसे ही 23 दिन बाद सकुशल अपने घर की दहलीज पर कदम रखा तो मां की ममता उमड़ पड़ी।  नीलम देवी ने बेटे ऋषभ पर फूल बरसाए, फिर आरती उतारी। भावुक होकर बेटे को गले लगाकर भगवान का शुक्रिया किया। वहीं राजा का तालाब की सुनीता देवी व पिता जसमेर चंदेल ने बेटे पारुल चंदेल के मणिमहेश से सकुशल लौटने पर आरती उतारकर व फूलों की बारिश की। प्रसाद बांटा ।
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23 दिन जीवन में कभी नहीं भूलेंगे:ऋषभ
ऋषभ ने बताया कि उन्होंने अपने चार साथियों दानिश, विक्की, पारुल के साथ वाया कुगती मणिमहेश की परिक्रमा करते हुए शिवकुंड में स्नान कर लिया। 18 से 23 अगस्त तक उनका मणिमहेश परिक्रमा सफर रहा। भरमौर पहुंचने पर 23 अगस्त शाम को लगातार तीन दिन बारिश से स्थिति बिगड़ने लगी। सोमवार को अपनी गाड़ी से जब वे भरमौर से चंबा के लिए गए तो तीन किलोमीटर पर जाने पर पत्थर गिरने लगे। तीन दिन प्रयास के बाद जब स्थिति भयावह देखी तो गाड़ी को भरमौर में खड़ा करके पैदल ही पगडंडियों और जंगलों के रास्ते लगभग 45 किलोमीटर सफर तय किया। सभी ने बताया कि पैदल चलते समय स्थानीय लोगों ने जगह-जगह फल, भोजन, पानी और सूखे मेवे देकर उनको घर जैसा महसूस करवाया। इनका कहना है कि भयावह मंजर में जानमाल का काफी नुकसान हुआ है। 20 से 25 जगह सड़क ही गायब हो चुकी है। 23 दिन जीवन में कभी नहीं भूलेंगे। डर की स्थिति में पल-पल गुजारना निसंदेह बेहद मुश्किल लगा।
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