1963 में सेना के बीआरओ के ग्रेफ विंग ने यहां सड़क बनाने का काम शुरू किया। सड़क बनाते समय रोजाना चट्टानें गिरने से किसी न किसी मजदूर की मौत हो जाए। सेना के लोग इससे काफी परेशान हो गए।
इस बीच तरंडा गांव के लोगों ने उन्हें गांव में बने मां चंद्रलेखा के मंदिर में जाने को कहा। देवी के गूर ने बताया कि जिस जगह से आप सड़क निकाल रहे हैं वहां शक्ति का वास है। देवी वहां स्थापित होना चाहती हूं।
इसके बाद सेना के लोगों ने यहां मंदिर का निर्माण करवाया और तरंडा गांव से मां की मूर्ति को लाकर यहां स्थापित किया। 1965 में मां का मंदिर बनने के बाद सड़क का काम भी पूरा हो गया और कोई हादसा भी नहीं हुआ। इसके बाद से मान्यता पड़ गई कि जो भी इस मंदिर में शीश नवाकर जाएगा उसके साथ कोई अनहोनी नहीं होगी।
निगुलसरी के तरंडा गांव में मां चंद्रलेखा का रथ अभी भी है। यहां भी माता का प्राचीन मंदिर है। त्योहारों पर मां चंद्रलेखा के रथ के लोग दर्शन करते हैं। मां इलाके के लोगों के कष्टों का निवारण करती हैं।
तरंडा मंदिर कमेटी के पूर्व अध्यक्ष चंपे लाल नेगी ने बताया कि उन्हें भी बुजुर्गों से इस बारे में पता चला था। एनएच-5 के किनारे इस मंदिर की देखरेख अब सेना ही करती है। सेना के जवान ही यहां पूजा पाठ का काम संभालते हैं।