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इस पोलिंग बूथ की सच्चाई है दर्दनाक

Fri, 25 Apr 2014 06:37 PM IST
बयूरो/ अमर उजाला, धर्मशाला
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कांगड़ा जिले में पौंग बांध के टापू पर बसे विस्थापितों की कहानी किसी दुखांत फिल्म से कम नहीं है। 7 मई का दिन करीब आ रहा है, लेकिन टापू के 28 परिवारों के 175 बाशिंदों की आंखों में कोई सपना नहीं।
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45 साल के लंबे संघर्ष, घुटन, शोषण, उपेक्षा से बाहर निकलने की सारी उम्मीदें अब इस टापू में कैद होकर रह गई हैं।

चुनाव आयोग टापू में एक बार फिर पोलिंग बूथ स्थापित करने में जुट गया है, लेकिन विस्थापितों को पता है कि सबसे बड़े लोकतंत्र का यह उत्सव उनकी जिंदगी में कोई खुशियां लेकर नहीं आने वाला।

339 गांव उजड़ गए

इन परिवारों की कहानी सच में दर्दनाक है। 1970 में पौंग बांध बना था ताकि प्यासे राजस्थान को नहरों के जरिए पानी दिया जा सके। तब करीब 20 हजार से ज्यादा परिवार यहां से पलायन के लिए मजबूर हुए थे।

कुल 339 गांव पौंग बांध में जलमग्न हो गए। विस्थापितों को राजस्थान सरकार के साथ-साथ केंद्र और हिमाचल की सरकार ने तमाम वादे किए थे। राजस्थान सरकार ने 15000 पात्र परिवारों में केवल दस हजार परिवारों को स्थापित किया। बाकी के लिए हाथ खड़े कर दिए।

आज भी 5000 से ज्यादा परिवार राजस्थान में मुआवजे के लिए दर-दर भटक रहे हैं। हिमाचल सरकार के पास भी इन विस्थापितों का दुख, दर्द, यातना को दूर करने की कोई ठोस नीति नहीं है। न हिमाचल के नेता राजस्थान सरकार पर अपने विस्थापितों के लिए दबाव बना पाए।

'दी लॉस्ट रूट्स' में दिखा दर्द

1971 में जब पौंग बांध में पानी भरने लगा तो कुठेड़ा गांव के लोग ऊंचे टापू पर आकर बस गए। पौंग बांध के निर्माण के लिए बीबीएमबी ने बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण किया।

चंद दीगर टापुओं में से कुठेड़ा ही एकमात्र टापू है जिस पर 28 परिवारों ने अपनी जमीन छोड़ने से इंकार कर दिया। वजह, राजस्थान सरकार ने उन्हें न बसने की जमीन दी न मुआवजा। हिमाचल में भी उन्हें कोई जगह नहीं मिली। 1971 में उन्हें जो मुआवजा मिला उससे वह खेती योग्य जमीन भी नहीं खरीद नहीं सकते थे।

उनकी अपनी बेशकीमती हरी भरी जमीन को पहले ही बांध ने लील लिया था। वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र राजन ने कुठेड़ा टापू पर दी लॉस्ट रूट्स नाम की डाक्युमेंट्री फिल्म तैयार की है जो यू ट्यूब पर मौजूद है।

न बिजली है न पानी

राजन कहते हैं अब कुठेड़ा टापू पर रहने वाले 28 परिवारों का टापू की जमीन पर मालिकाना हक भी नहीं रह गया है। फिर 45 साल से टापू पर रह रहे ये विस्थापित आखिर कहां जाएं। वे अपने वजूद, पहचान और खोयी हुई जड़ों की तलाश में जूझ रहे हैं। संविधान में दर्ज मौलिक अधिकार उनके लिए मायने नहीं रखते।

जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वे पूरी तरह वंचित हैं। यहां न बिजली है न पानी और न स्कूल व डिस्पेंसरी या कोई दुकान। यहां का हर व्यक्ति सरकार से नाराज है। हरनाम सिंह कहते हैं चुनाव के वक्त नेता नाव से वोट मांगने आ जाते हैं और झूठे वायदे कर लौट जाते हैं।

टापू के 126 वोटर यह सोच कर बार-बार अपने वोट का प्रयोग करते हैं कि कभी तो उनकी सुनी जाएगी। सुजान सिंह पठानिया फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक और हिमाचल सरकार में कृषि मंत्री हैं। कुठेड़ा के लोगों ने अपने नेता से सोलर लाइट की मांग की थी जो आज तक पूरी नहीं हुई।

न मेधा पाटेकर यहां आईं और न केजरीवाल

पौंग बांध विस्थापितों की आवाज बुलंद करने न आज तक मेधा पाटेकर यहां आईं और न केजरीवाल। हिमाचल सरकार मानती है कि अब कुठेड़ा टापू की जमीन पर हिमाचल सरकार का कोई हक नहीं। फिर विकास कैसे हो? कुठेड़ावासी भी भारत के नागरिक हैं। उन्हें वोट देने का अधिकार है। टापू पर तीसरी बार बूथ बनाया जा रहा है।

सवाल यह है कि वे किसे और क्यों वोट दें? आखिर वे अपना कीमती वोट क्यों बर्बाद करें। यहां के लोगों के वोटर आई कार्ड बने हैं। आधार कार्ड बने हुए हैं। राशन कार्ड भी बने हैं। टापू पर बसा कुठेड़ा गांव पंचायती राज अधिनियम के तहत बाड़ी ग्राम पंचायत का एक वार्ड है।

लेकिन किसी तरह की विकास योजनाओं पर आज तक काम नहीं हुआ। मनरेगा योजना से भी लोग वंचित हैं। यहां कोई जॉब कार्ड होल्डर नहीं हैं। रोजी रोटी कमाने का जरिया केवल मात्र टापू की जमीन पर खेतीबाड़ी और बांध में मछली पकड़ना है।
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उम्मीद, शायद इस बार कुछ मिले

लोग कहते हैं अगर हिमाचल सरकार की इच्छा शक्ति हो तो वह टापू पर मूलभूत सुविधाएं जुटा सकती है। अगर भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) 45 साल से कुठेड़ा टापू पर 28 परिवारों को स्थायी रूप से बसे रहने के लिए राजी हो सकती तो बोर्ड को टापू पर जीवन की बुनियादी सुविधाओं के सृजन से इनकार क्यों होगा।

सरकार चाहे तो गैर सरकारी संस्थाओं के जरिए भी यहां विकास कार्य शुरू कर सकती है। लेकिन हिमाचल सरकार के सभी मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और विधायकों को कुठेड़ावासियों के प्रति नजरिया अत्यंत संवेदनहीन रहा है।

फिर भी कुठेड़ा वाले वोट देंगे। इस उम्मीद के साथ कि शायद इस बार उनका वोट अपनी ताकत दिखाए।
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