शिमला। पब्बर घाटी में पीढ़ियों से गूंज रहे विवाह और फसल कटाई के लोकगीत अब विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक पहुंचेंगे। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग ने ऐसी लोक परंपराओं को अकादमिक दुनिया से जोड़ने के लिए एक नई शोध परियोजना शुरू की है। परियोजना में इन लोकगीतों का संग्रह किया जाएगा, उनका अंग्रेजी अनुवाद होगा और उन्हें शोध सामग्री के रूप में विकसित किया जाएगा। सॉन्ग्स ऐज ओरल लिटरेचर, ट्रांसलेटिंग वेडिंग एंड हार्वेस्ट ट्रेडिशंस ऑफ पब्बर वैली (पहाड़ी कल्चर एंड हेरिटेज) शीर्षक वाली यह परियोजना शिक्षा मंत्रालय की पीएम-उषा योजना के मेरू (सॉफ्ट कंपोनेंट) के तहत स्वीकृत हुई है। नौ माह की इस परियोजना की प्रधान अन्वेषक डॉ. सीमा हैं। परियोजना के दौरान शोध दल पब्बर घाटी के गांवों में जाकर स्थानीय लोगों और लोकगायकों से पारंपरिक गीतों का संकलन करेगा। इसके बाद इन गीतों का अंग्रेजी अनुवाद, दस्तावेजीकरण और अकादमिक विश्लेषण किया जाएगा। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि इन लोकगीतों में स्थानीय समाज, कृषि जीवन, पारिवारिक संबंधों और सांस्कृतिक परंपराओं का चित्रण किस तरह मिलता है। शोध पूरा होने के बाद यह सामग्री भारतीय लोक साहित्य और हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन में संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोगी हो सकेगी। परियोजना के लिए एक रिसर्च असिस्टेंट, इन्वेस्टिगेटर का चयन किया जाएगा। चयनित अभ्यर्थी फील्ड सर्वे, लोकगीतों के संकलन, आंकड़ों के विश्लेषण और शोध रिपोर्ट तैयार करने में सहयोग करेंगे। सामाजिक विज्ञान विषय में स्नातकोत्तर अभ्यर्थी 28 जून तक आवेदन कर सकते हैं। साक्षात्कार एक जुलाई को होगा।
लोकगीतों में छिपा है हिमाचल का सामाजिक इतिहास
पब्बर घाटी शिमला जिले के रोहड़ू, जुब्बल और कोटखाई क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान है। यहां के लोकगीत केवल गीत नहीं बल्कि स्थानीय समाज, खेती-बाड़ी, पारिवारिक रिश्तों और रीति-रिवाजों का जीवंत दस्तावेज हैं। अधिकांश गीत आज भी लिखित रूप में उपलब्ध नहीं हैं और केवल लोक स्मृति में सुरक्षित हैं। इस शोध के बाद इन मौखिक परंपराओं को दस्तावेजी स्वरूप मिलेगा, जिससे हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत देश-विदेश के शोधकर्ताओं तक पहुंच सकेगी।