दलाईलामा ने कहा कि बुद्धत्व सभी दोषों और बाधाओं से मुक्त और सभी गुणों से संपन्न अवस्था है। हम इसे स्पष्ट प्रकाश के सहज मन को नियोजित करके प्राप्त करते हैं। यह हमारे भीतर है और इसे आत्मज्ञान के मार्ग में बदल सकते हैं।
तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा ने कहा कि बुद्धत्व सभी दोषों और बाधाओं से मुक्त और सभी गुणों से संपन्न अवस्था है। हम इसे स्पष्ट प्रकाश के सहज मन को नियोजित करके प्राप्त करते हैं। यह हमारे भीतर है और इसे आत्मज्ञान के मार्ग में बदल सकते हैं। मैक्लोडगंज के मुख्य बौद्ध मंदिर में दो दिवसीय टीचिंग में तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा ने बौद्ध अनुयायियों और मंगोलिया से आए अनुयायियों को चक्रसंवर अभिषेक की प्रारंभिक प्रक्रियाओं पर उपदेश देते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि तिब्बत में तंत्र व्यापक रूप से फैला है।
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चक्रसंवर के संबंध में घंटापद और लुइपा परंपराएं लोकप्रिय थीं, लेकिन यह कृष्णाचार्य वंश काफी दुर्लभ था। मैंने इसे तगडग रिंपोछे से प्राप्त किया और अभ्यास के लिए लंबे समय से घनिष्ठ संबंध महसूस किया है। जहां तक इस अभिषेक का संबंध है, हम इसे उच्च पुनर्जन्म प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्त करने के साधन के रूप में लेते हैं। तंत्र का अभ्यास करने के लिए हमें एक देवता के रूप में स्वयं की स्पष्ट दृष्टि की आवश्यकता होती है। इसलिए हम अपने आप को एक साधारण प्राणी के रूप में देखते हैं और हेरुका या चक्रसंवर में परिवर्तित हो जाते हैं।
बोधिसत्व संवर देने से पहले दलाईलामा ने बोधिचित्त के विकास के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने उल्लेख किया कि यह चित्त की शांति लाता है। उन्होंने कहा कि वह बोधिचित्त उत्पन्न करते हैं और प्रतिदिन सुबह उठते ही शून्यता पर चिंतन करते हैं। वहीं, उन्होंने शांतिदेव के बोधिसत्व मार्ग में प्रवेश के ग्रंथ का वर्णन किया। यह ग्रंथ बोधिचित्त के गुणों और इसे विकसित करने के तरीकों को सबसे अच्छी तरह से स्पष्ट करती है।
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उन्होंने कहा कि अभिषेक के आचरण में आने वाली किसी भी बाधा को दूर करने का प्रयास करते हैं, जबकि असली बाधा हमारे भीतर की अज्ञानता है। इसलिए शायद हम उन लोगों पर विचार कर सकते हैं, जो अपने वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ हैं। इसमें यह समझना शामिल है कि क्या आचरण अपनाना है और क्या त्यागना है। इसके द्वारा हम अपने आप को बदल सकते हैं।