साल 1970 में स्टीम इंजन को बंदकर डीजल इंजन से ट्रेनों का संचालन शुरू हुआ। डीजल इंजन में सामान्य कोच के साथ विस्ताडोम कोच और रेलमोटर कार की सुविधा भी मिल रही है। विस्ताडीम कोच में बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियां हैं। इसके अलावा हाइड्रोजन ट्रेन चलाने की भी योजना है। इसके लिए शिमला से कालका मार्ग में तीन हाइड्रोजन गैस स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। हाइड्रोजन ट्रेन को प्रदूषण रहित स्वच्छ माना जाता है और वातावरण के अनुकूल है।
पुराना बस अड्डा के पास बने बाबा भलकू रेल संग्रालय में फालका शिमला रेलवे का इतिहास संजोकर रखा गया है। यहां 1903 में ट्रेनों को दुरुस्त करने वाले औजारों के साथ स्टीम इंजन के साथ चल रही ट्रेन के चित्र भी शामिल हैं। शिमला-कालका ट्रैक की कुल लंबाई 96.60 किलोमीटर है। रेल लाइन में 18 स्टेशन, 102 टनल और 912 ब्रिज है। बड़ोग टनल सबसे लंबी 1143 मीटर है। साल 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अ भी इस मार्ग से यात्रा की है।
यूनेस्को से मिला है विश्व धरोहर का दर्जा
साल 1864 में अंग्रेजों ने शिमला को अपनी शीतकालीन राजधानी बनाया था। इसके बाद कोलकाता से शिमला आने के लिए इस नैरोगेज लाइन को पिछाने की योजना बनाई गई। इस रेल लाइन के लिए सबसे पहले साल 1984 में सर्वे करवाया गया था। हालांकि इसके बाद कई सबै हुए। साल 1898 में इसका कार्य शुरू हुआ और 1903 में काम पूरा पर इसे यातायात के लिए खोला गया। 8 जुलाई 2008 को यूनेस्को ने इस ट्रैक को विश्व धरोहर का दर्जा दिया। गिनीज बुक ऑफ रेल फक्टस एंड फोट ने कालका शिमला रेलवे को भारत में छोटी लाइन की महानतम इंजीनियरिंग के रूप में रिकॉर्ड किया है।
रेलवे के डीआरएम अंबाला मंडल ने बताया कि शिमला-कालका रेल मार्ग 9 नवंबर को 122वें साल में प्रवेश कर गया है। 1903 में यातायात के शुरू किए ट्रैक पर स्टीम इंजन से ट्रेन का संचालन किया जाता था। अब डीजल इंजन से देने चलाई जा रही है। इस ट्रैक पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाने की भी योजना है।