बिलासपुर में सतलुज का अब ऐसा नजारा दिखता है।
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किन्नौर से बिलासपुर-मंडी सीमा पर बने कोलबांध विद्युत परियोजना तक 230 किलोमीटर लंबी सतलुज नदी 73 किलोमीटर तक के दायरे में सूख गई है। बिजली परियोजनाओं को इस समस्या का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। नाथपा-झाकड़ी विद्युत परियोजना के लिए 49 किलोमीटर और रामपुर परियोजना के लिए 24 किलोमीटर लंबी टनल बनाई गई है।
नदी का सारा पानी इन टनल के जरिए गुजारा जा रहा है। नियमानुसार नदी का 15 फीसदी पानी प्रोजेक्ट प्रबंधन को छोड़ना ही होता है, लेकिन अधिकतर समय नदी सूखी रहती है। सतलुज पर शोंग-टोंग, जंगी थोपन, थोपन पवारी और खाब में भी बिजली परियोजनाएं प्रस्तावित हैं।
यदि ये धरातल पर उतरती हैं तो टनल बनने से 100 किलोमीटर नदी और सूख जाएगी। यानी कुल मिलाकर सूखी नदी का दायरा 173 किलोमीटर तक बढ़ जाएगा। विश्व बैंक के सहयोग से किए गए सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि बिजली परियोजनाओं से नियम के मुताबिक 15 फीसदी पानी नहीं छोड़ा जा रहा है।
स्पीति से कौल डैम तक हुए सर्वे में पाया गया है कि सारा पानी कई किलोमीटर तक टनल के जरिए गुजरने से नदी के आसपास की जमीनें बंजर होने लगी हैं। कोल बांध बनने से बिलासपुर की गोबिंद सागर झील पर भी इसका असर पड़ा है।
सर्वे टीम में शामिल ‘सतलुज बचाओ, जीवन बचाओ’ अभियान के संयोजक और पूर्व डीएफओ आरआर भलैक ने सतलुज के सूखने संबंधी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी है।