उम्मीदों के साये में ये जिंदगी,
जिंदगी के साये में खुशियां।
बेटी बचाना अपना फर्ज समझो,
ताकि सलामत रहे ये दुनिया।
कुछ इन पंक्तियों के साथ हिमाचल की बेटी हिमा ने अपने इरादे बयां कर दिए हैं। सुनिए उसकी जुबानी पूरी कहानी।
न खुद का घर, न जमीन और न ही जायदाद। दूसरों के घर में काम कर मेरे मां-बाप ने मुझे शिक्षा दी। उनके इसी संघर्ष को देखकर मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।
मां करीब 25 साल से दूसरों के घरों में काम कर रही हैं। पिताजी 10 साल की उम्र में नाहन आ गए। तब से उनका संघर्ष जारी है। सब्जी की दुकान की, लेकिन वह भी कुछ दिन बाद किसी ने छीन ली। पिताजी गरीब घर से थे, इसलिए उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाए। माता संपन्न घराने से हैं, लेकिन किस्मत के आगे किसी का जोर नहीं चलता है।
जिंदगी में कुछ ऐसा करके दिखाउंगी कि सबको मुझ पर नाज होगा। सिरमौर की हिमा शर्मा ने अपनी भावनाओं को कुछ इस तरह शब्दों में बयां किया।
कहती हैं कि हमारे समाज की एक संकीर्ण सोच आज भी बरकरार है कि किसी के घर में काम करने वाले को गिरी हुई नजरों से देखा जाता है। मेरी मां के सामने जब भी ऐसी स्थिति आई तो उन्होंने इन सबको हमेशा नजरअंदाज किया।