मान्यता के अनुसार राजा राजेंद्र चंद कटोच को एक रात को सोते समय सपना आया, जिसमें कि ब्यास नदी के किनारे उन्हें एक शिवलिंग की बात का पता चला। राजा ने अपने सैनिक भेजकर इस शिवलिंग को खोजा और वहीं पर कटोच वंश की ओर से इस मंदिर की स्थापना की गई।
जिसे आज लंबलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग की विशेषता यह है कि यह हर चार वर्ष के बाद शिवरात्रि वाले दिन एक चावल के दाने जितना आकार बढ़ा लेता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति सावन के महीने में विधि-विधान से लगातार 40 दिन इस मंदिर में पूजा-अर्चना करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।
इस मंदिर के प्रांगण में राधा-कृष्ण, शिव परिवार, गणपति महाराज, शनिदेव और शीतला माता की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। शिवरात्रि के दिन इस मंदिर में दूर-दूर से लोग आते हैं और हर वर्ष यहां भंडारे का आयोजन किया जाता है। इस मंदिर की शैली बैजनाथ में स्थित शिव मंदिर से ली गई है, उसी शैली में इसे बनवाया गया है जो कि आज भी पहले जैसा ही है।