बादल फटना हो सकती है भूस्खलन की वजह
1987 से लेकर समरहिल में इस तरह का भूस्खलन आज तक नहीं देखा जिसने पूरे परिवार ही खत्म कर दिए हों। यह सिर्फ भूस्खलन की घटना नहीं है। पानी इतना था कि जिसने एडवांस्ड स्टडीज से लेकर पेड़ों को करीब दो किलोमीटर दूर तक पहुंचा दिया। शिव बावड़ी से बह कर गए शव और शवों के हिस्से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर श्मशानघाट पहुंच गए। यह बादल फटने की घटना में ही संभव है। -प्रो. श्याम लाल कौशल, प्रोफेसर बिजनेस स्कूल एचपीयू
पहले से धंसती रही है घटना स्थल पर जमीन
जहां भूस्खलन हुआ है, वहां लगातार भूस्खलन होता रहा है, जमीन धंसती रही है। 1980 के आसपास भी यहां एडवांस स्टडीज की सड़क के साथ लगती भूमि पर भूस्खलन हुआ था जिससे कई दिनों तक सड़क बाधित रही थी। इस हादसे के लिए पानी की सुव्यवस्थित निकासी का समय से इंतजाम न किया जाना भी वजह हो सकती है। ऊपरी हिस्से से भूस्खलन होने और अधिक बारिश से दलदल बनी जमीन पूरी तरह से ढह जाने से तबाही हुई है। 50 सालों से समरहिल में रहते हुए उन्होंने भूस्खलन की इतनी बड़ी घटना नहीं देखी। - प्रो. सुरेश कुमार, सेवानिवृत शिक्षक एचपीयू
20 साल पहले भी हुआ था भूस्खलन
78 साल की उम्र में इतना भयानक हादसा कभी नहीं देखा जिसमें दर्जनों लोगों की जान चली गई। घटना स्थल से करीब तीन किलोमीटर दूर तक पेड़ों की छाल उखड़ी हुई थी। बीस साल पहले शिव बावड़ी के पास भूस्खलन हुआ था जिसमें करीब छह से सात पेड़ गिरे थे। मंदिर से करीब दो सौ मीटर दूर वह घर में सुबह की चाय पी रहे थे तो हेलीकॉप्टर जैसी गड़गड़ाहट सुनी फिर कुछ गिरने की तेज आवाज आई। फिर मालूम हुआ कि मंदिर गिर गया। यह जो भी था तबाही थी। - राम स्वरूप, शिव बावड़ी एमआई रूम