चुनावी साल में पूर्व सैनिकों के मुद्दे फिर चर्चा में हैं। लाखों की तादाद में वोट बैंक रखने वाले पूर्व सैनिक विधानसभा चुनाव से पूर्व सरकारी फैसलों के नफे नुकसान का आकलन करने में जुट गए हैं। कांग्रेस सरकार दावे करती है कि उसके कार्यकाल में पूर्व सैनिकों के लिए ज्यादा सुविधाएं दी गई हैं। जबकि भाजपा इन दावों को खारिज कर खुद को पूर्व सैनिकों की सबसे बड़ा परोपकारी बता रही है। लेकिन दोनों बड़े दलों के दावों को पूर्व सैनिक खारिज करते हैं।
दिल्ली स्थित जंतर मंतर में पिछले 835 दिनों से धरने पर बैठे हिमाचल के मेजर प्यार चंद राणा कहते हैं कि दोनों दलों ने पूर्व सैनिकों को छला है। केंद्र सरकार ने जो वन रैंक वन पेंशन दिया है, उसके रिव्यू में पांच वर्ष की शर्त थोंप दी है, जिससे एक रैंक पांच पेंशन की स्थिति पैदा हो गई है। उधर कोटे की सरकारी नौकरी में सेना का वरिष्ठतम लाभ खत्म होने से भी पूर्व सैनिकों में नाराजगी है। इन तमाम मामलों पर मंथन कर रहे पूर्व सैनिकों पर सियासी दलों की भी टकटकी लग गई है।
कोटे की नौकरी में वरिष्ठता का लाभ खत्म
साढ़े चार दशक से कोटे की नौकरी में वरिष्ठता और वित्तीय लाभ ले रहे ज्यादातर पूर्व सैनिकों में चुनावों से पहले निराशा का आलम है। वरिष्ठता लाभ खत्म होने से पूर्व सैनिकों में चुनावों से पहले निराशा का आलम है। वरिष्ठता लाभ खत्म होने से सूबे में पूर्व सैनिक परिवारों पर प्रतिकूल असर पड़ना लाजमी है। ऐसे में विधानसभा चुनाव के दौरान पूव सैनिकों के लिहाज से यह सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है। प्रदेश सरकार ने इस मामले पर 5 अगस्त को कैबिनेट में डिमोबलाइजड आम्र्ड फोर्सिस पर्सनल रूल को खत्म करने का फैसला लिया था। पूर्व सैनिकों का विरोध मुखर हुआ तो अगले ही दिन मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के इस फैसले पर रोक लगाकर पूर्व सैनिकों को साधने की कोशिश की। लेकिन हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी पूर्व सैनिकों को कोई राहत नहीं दी है।
इसलिए बनाया था प्रदेश सरकार ने नियम
पूर्व सैनिकों को पुन: रोजगार में वरिष्ठता और वित्तीय लाभ देने के हिमाचल सरकार ने डेमोबिलिसेड आम्र्ड फोर्स एक्ट 1972 के नियम 5 (1) को केवल इमरजेंसी ऑपरेशन के बाद बिना पेंशन के घर लौटे नॉन पेंशनरों के लिए बनाया था। वर्ष 1962, 1965 और 1971 के युद्ध में देश की सेना में सैनिकों की संख्या कम होने के चलते कई लोगों को सेना में भर्ती किया गया था। लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद इन्हें बिना पेंशन के घर वापस भेज दिया था। कइयों ने एक वर्ष तो कइयों ने दो से तीन वर्ष तक सेना में नौकरी की थी। इन्हें प्रदेश में पुन: रोजगार देते समय वरिष्ठता और वित्तीय लाभ दिया गया। लेकिन बाद में वोट बैंक की राजनीति के कारण अन्य पूर्व सैनिकों को भी इस तरह के लाभ देते रहे। 15 वर्ष तक सेना की नौकरी करने के बाद पूर्व सैनिकों को पेंशन के अलावा प्रदेश सरकार में भी 15 वर्ष का सेवालाभ मिलता रहा, जिससे सालों से पदोन्नति के इंतजार में बैठे अधिकारी और कर्मचारी प्रभावित हुए। साथ ही नवनियुक्त कर्मचारी संबंधित विभाग में तैनात कर्मचारी से पदनाम में वरिष्ठ हो गया और वेतन में भी वृद्धि होती रही। जिसे कई कर्मचारियों ने तर्कसंगत नहीं माना।
प्रदेश में पूर्व सैनिकों की यह है स्थिति
सूबे में थल सेना, वायु और नौसेना से कुल 1.12 लाख पूर्व सैनिक हैं। इसके अलावा 940 वॉर विडो हैं। प्रदेश में 33684 वीर नारियां हैं।