प्रियंका ने प्यारे राम को काष्ठकुणी शैली में अपने मकान की छत पर स्लेटनुमा छत बनाने के लिए कुशल कारीगर लाने को कहा था। ठेकेदार ने जब बगस्याड़ के दोनों हुनरमंदों को छराबड़ा पहुंचाया तो उनकी कारीगरी देख प्रियंका गदगद हो गईं थीं। कारीगर आलम चंद का कहना है कि उन्होंने प्रियंका के मकान की स्लेटनुमा छत को बनाने के लिए कड़ी मेहनत की थी। काम की तारीफ सुनकर उन्हें बहुत गर्व महसूस हुआ था।
भाई से सीखा है हुनर
आलम चंद ने छत की कारीगरी का काम अपने भाई दयाराम से सीखा था। हालांकि, दया राम कंकरीट का मिस्त्री था। लेकिन आलम का शौक बचपन से ही लकड़ी पर कारीगरी का था। शिष्य भाग सिंह भी काष्ठकुणी शैली की बारीकियों को आलम से काफी हद तक सीख चुका है।
अब दोनों ही निर्माण की शैली में साथ मिलकर काम कर रहे हैं। दोनों कारीगरों को मलाल है कि हिमाचल में कंकरीट निर्माण की संस्कृति ने प्राचीन काष्ठकुणी शैली को बुरी तरह से प्रभावित किया है।
उन्होंने कहा कि मंडी, कुल्लू और शिमला जिले में वे अनेक मकानों को काष्ठकुणी शैली का रूप दे चुके हैं। इस शैली की खासियत लकड़ी पर की गई नक्काशी है, जो हिमाचल कला की एक विशेष पहचान है। इसे हाथ से उकेरा जाता है। इसी वजह से इसमें खासा समय लगता है।