देश के संविधान और कानून से ऊपर कोई भी नहीं है। चाहे वह कोई भी क्यूं न हो। न्यायालय का निर्णय सर्वमान्य है। न्यायिक फैसले के तहत कानून के आधार पर ही लोकसभा से राहुल गांधी की सदस्यता रद्द हुई है, न की राजनीतिक आधार पर। कांग्रेस पार्टी को इस पर व्यर्थ में होहल्ला और शोर शराबा नहीं करना चाहिए। वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता खत्म होने के मुद्दे पर कांग्रेस के विरोध पर प्रतिक्रिया देते हुए शुक्रवार को मीडिया में यह बात कही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की ओर से लोकसभा सचिवालय की कार्रवाई को गलत बोलना उचित नहीं है और न ही न्यायसंगत है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 के अनुसार बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि किसी जनप्रतिनिधि को 2 वर्ष या उससे अधिक की सजा होती है तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी। हालांकि, तब जनप्रतिनिधि अपील करने अगले कोर्ट में जाते थे और उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती थी। लेकिन, वर्ष 2013 में लिली थॉमस बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून में बदलाव करते हुए कहा कि 2 वर्ष या उससे अधिक की सजा होने पर तत्काल प्रभाव से जनप्रतिनिधि चाहे विधायक हो या सांसद हो, की सदस्यता खत्म हो जाएगी। भले ही वह अपील के लिए बड़े कोर्ट में जाते रहें। उस वक्त यूपीए की सरकार देश में थी और मनमनोहन सिंह तत्कालीन प्रधानमंत्री।
उन्होंने कहा कि तत्कालीन मनमोहन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को बदलने के लिए एक अध्यादेश लाया था कि किसी भी जनप्रतिनिधि को 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा होगी तभी उसकी सदस्यता रद्द होगी। लेकिन, तब राहुल गांधी ने उस अध्यादेश को बकवास बताते हुए सरेआम उसकी कॉपी फाड़ दी थी। जिसकी बहुत चर्चा भी हुई थी। इस कानून को लेकर यूपीए सरकार का अध्यादेश लागू नहीं हो पाया और बाद में लालू प्रसाद यादव की सदस्यता गयी। फिर आजम खान की गई और बाद में उनके बेटे की सदस्यता रद्द हुई। इस प्रकार आज तक सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के आधार पर कई लोकसभा और विधानसभा सदस्यों की सदस्यता जा चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय के उसी फैसले के आधार पर अब राहुल गांधी पर कार्रवाई हुई है।