मांग का 10 फीसदी बीज ही उपलब्ध
परंपरागत तकनीक से सीपीआरआई मौजूदा समय में देश की मांग का 10 फीसदी बीज ही उपलब्ध करवा पा रहा है। एरोपोनिक तकनीक इससे कई गुना अधिक बीज उत्पादन करने में सक्षम है। एरोपोनिक तकनीक में नियंत्रित तरीके से पॉलीहाउस के भीतर आलू बीज उत्पादन होता है। सबसे बेहतर टिशू कल्चर (कंद) या पौधा लगाया जाता है, उससे पहले साल में मिनी ट्यूबर बनाए जाते हैं। मिनी टयूबर को दो से तीन जनरेशन आगे बढ़ाकर खेतों में लगाकर संख्या बढ़ाई जाती है और इसके बाद किसानों को फसल लगाने के लिए उपलब्ध करवाया जाता है।
आलू बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित होगी
सीड प्लॉट तकनीक की मदद से आलू बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाती है। आलू बीज उत्पादन की सामान्य तकनीक में पहले साल में एक टिशू कल्चर या एक पौधे से 6 से 8 आलू बनते हैं, जबकि एरोपोनिक तकनीक में पौधे की जड़ें हवा में लटकी होती हैं और बहुत छोटे आकार पर ही बीज आलू को तोड़ लिया जाता है, इसलिए एक पौधे से 50 से 70 मिनी टयूबर (छोटे बीज आलू) मिल जाते हैं।
क्या है एरोपोनिक तकनीक
एरोपोनिक्स मिट्टी के बिना पौधे उगाने की एक तकनीक है। इसमें पौधों की जड़ों को हवा में लटकाकर, उन पर पोषक तत्वों या पानी का छिड़काव किया जाता है। इससे पौधों को जरूरी पोषक तत्व हवा और पानी से मिलते हैं और वह प्राकृतिक रूप से विकसित हो पाते हैं।
देश में आलू बीज की मांग पूरी करने में एरोपोनिक तकनीक महत्वपूर्ण साबित होने वाली है। उम्मीद है 7 से 8 सालों में60 फीसदी आलू बीज इस तकनीक से उपलब्ध करवाया जा सकेगा। - ब्रजेश सिंह, निदेशक, सीपीआरआई