कश्मीरी विस्थापितों की लड़ाई लड़ने वाले और खुद विस्थापित होने का दंश झेल चुके मशहूर कवि अग्निशेखर ने कहा कि नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में शुरू में ही जब जम्मू आए तो कश्मीरी पंडितों को आशा थी कि वे हमारे बारे में कुछ बोलेंगे।
हमारी बात करेंगे। बातें हुईं कि इतिहास रचा मोदी की इस रैली ने। मोदी-भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार.. सबके बारे में बोले। वहां जम्मू में जो शरणार्थी पाकिस्तान से आया हुआ है, उसके बारे में बात की।
पीओके के रिफ्यूजी, लद्दाखियों के बारे में बोले। कारगिल के शिया समुदाय के लोगों के बारे में बोले। गुज्जर-बकरवालों पर बोले, विकास पर बोले, अगर वह किसी बात पर नहीं बोले तो कश्मीरी पंडितों पर नहीं बोले। उनकी पीड़ा पर नहीं बोले।
मोदी लहर से नहीं, विकल्पहीतना से जीतेंगे
मशहूर हिंदी कवि अग्निशेखर ने शिमला में मंगलवार को अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि यह कश्मीरी पंडितों के लिए मोहभंग की सूचना है। क्योंकि हर राजनीति के अपने पैंतरे होते हैं।
जिस देश में यही तय नहीं है कि ये जो माइनॉरिटी है ये किसी प्रदेश में मेजोरिटी है, उसका क्या हो सकता है। कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में कोई अंतर नहीं है। मेरे लिए हर पार्टी के भेद मिट गए हैं।
जिस दौर में हम गुजर रहे हैं, अगर मोदी आते भी हैं तो भी नहीं लगता है कि वह मोदी का जादू होगा। यह विकल्पहीनता की स्थिति होगी। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ युवा वर्ग का वोट होगा।
मशहूर कवि ने खड़े किए कई बड़े सवाल
इस मशहूर कवि ने कहा कि मेरा सवाल ये है कि क्या बुद्धिजीवी वो भूमिका निभा रहा है, जो उसे निभानी चाहिए। क्या वह निर्लिप्त और स्वतंत्र चेता होकर बात कर रहा है या अपना पक्ष पहले से ही तय कर रहा है।
इस बीच दो पक्ष खूब छाये रहे। एक पक्ष व्यक्ति विशेष या पार्टी के साथ रहा या उसके विरोध में रहा। जैसे मोदी के पक्ष में या उनके खिलाफ। मैं कई बार मोदी विरोध को भी प्रश्न से प्रश्नांकित करता हूं।
क्या आप दूसरे मौके पर जब मोदी को सांप्रदायिकता के रूप में देखते हैं। दूसरा पक्ष भी देखते हैं। मुझे भारतीय बुद्धिजीवियों के एक बडे़ वर्ग के छद्म पर अफसोस है।
कोई कश्मीरी पंडितों की नहीं सोचता
इस मश्ाहूर कवि ने कहा कि मैं अपनी बात को ऐसे स्पष्ट करता हूं - कश्मीर से सांप्रदायिकता के आधार पर धार्मिक उमभनाद और जेहाद के नाम पर एक धर्म विशेष लोगों को मार-मारकर बाहर किया गया। यह 1990 में हुआ।
तबसे लेकर आज तक लगातार चल रहा है। लाखों कश्मीरी हिंदुओं को बाहर किया गया। यहां भारत की धर्मनिरपेक्षता की धज्जियां उड़ाई गईं। कोई बुद्धिजीवी बोला नहीं, क्यों?
कश्मीरी पंडितों को अपने पुरखों का घर चाहिए। उसे कोई नहीं दिला रहा। अग्निशेखर इन दिनों शिमला आए हुए हैं। हाल ही में वे जम्मू-कश्मीर अकादमी का पुरस्कार लौटाने को लेकर चर्चा में हैं।