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Shimla News: एचपीयू में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नियमों में पीएचडी शुरू

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अब चार वर्षीय स्नातक सीधे ले सकते हैं पीएचडी में प्रवेश, सीमित सीटें और सख्त नियमों के बीच हो रही काउंसलिंग
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नए सत्र से पहली बार लागू हो रहे विवि में नए नियम

संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) में पीएचडी शुरू हो गई है। सत्र 2025-26 के लिए विश्वविद्यालय ने 194 सीटों पर पीएचडी में दाखिले की प्रक्रिया आरंभ कर दी है।

अभी इसका लाभ वहीं छात्र उठा पाएंगे जिन्होंने यूजी डिग्री चार साल में की होगी। प्रदेश में कुछ ही संकाय हैं जिसमें यूजी डिग्री चार साल की है। इसमें बीटेक और एचएम सहित एलएलबी भी शामिल है। लिहाजा इसका लाभ अभी उन्हीं राज्यों के छात्रों को मिलेगा जहां एनईपी के तहत यूजी डिग्री शुरू हो चुकी है। बदले हुए नियमों के तहत इस बार पीएचडी में प्रवेश चार वर्षीय स्नातक (यूजी डिग्री धारक) से सीधे संभव होगा। सीटें मार्गदर्शकों की उपलब्धता से जुड़ी होंगी और शोध प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सख्त तथा समयबद्ध रहेंगी। विश्वविद्यालय ने सभी विभागों को निर्देश दिए हैं कि काउंसलिंग और प्रवेश प्रक्रिया 26 से 31 दिसंबर के बीच पूरी की जाए। एनईपी के तहत सबसे अहम तकनीकी बदलाव पीएचडी सीटों के निर्धारण में किया है। अब किसी भी विभाग में पीएचडी सीटें मनमाने ढंग से तय नहीं की जा सकेंगी।
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प्रत्येक विभाग में सीटों की संख्या उपलब्ध मार्गदर्शकों की संख्या और उनकी स्वीकृत क्षमता के आधार पर तय होंगी। चयन प्रक्रिया को भी पूरी तरह पुनर्गठित किया है। चयन 100 अंकों के आधार पर होगा। इसमें जेआरएफ, नेट या विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश परीक्षा के अंकों को 70 प्रतिशत अनुपात में वरियता दी जाएगी। शेष 30 अंक साक्षात्कार के होंगे। साक्षात्कार में शैक्षणिक उपलब्धियां, शोध प्रस्ताव की गुणवत्ता, विषय की समझ, प्रस्तुति और प्रस्ताव की रक्षा को आंका जाएगा। विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि केवल पात्रता शर्तें पूरी करना या परीक्षा पास करना प्रवेश का अधिकार नहीं होगा।

दाखिले के बाद शोध प्रक्रिया में भी तकनीकी रूप से कड़े प्रावधान लागू किए हैं। पीएचडी पाठ्यक्रम को अनिवार्य और सख्त बनाया गया है। उपस्थिति, आंतरिक मूल्यांकन और उत्तीर्णता के मानक तय किए हैं। पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा किए बिना शोध कार्य आगे नहीं बढ़ सकेगा। इसके अतिरिक्त प्रत्येक पीएचडी शोधार्थी को अपने शोध काल के दौरान प्रति सप्ताह 4 से 6 घंटे तक शिक्षण, ट्यूटोरियल, प्रयोगशाला कार्य से जुड़ा होना अनिवार्य किया है।
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शोध की निगरानी व्यवस्था भी बदली
शोध की निगरानी व्यवस्था को भी एनईपी के अनुसार पुनर्गठित किया है। शोध विषय की मंजूरी, प्रगति रिपोर्ट, संशोधन और आगे की अनुमति तय समय सीमा में लेनी होगी। समय पर प्रगति न होने की स्थिति में शोध कार्य रोका भी जा सकता है। यह व्यवस्था लंबे समय तक लटके शोध कार्यों पर रोक लगाने के लिए लागू की है। शोधपत्र जमा करने की प्रक्रिया में भी तकनीकी बदलाव किए गए हैं। प्री-थीसिज प्रस्तुति अनिवार्य होगी। बाहरी परीक्षकों का चयन, मूल्यांकन रिपोर्ट और अंतिम मौखिक परीक्षा की प्रक्रिया तय ढांचे में होगी। प्रत्येक चरण का रिकॉर्ड रखा जाएगा ताकि किसी स्तर पर अनावश्यक देरी न हो। पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाई गई है।
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