आईजीएमसी के डॉक्टर परिवार दत्तक ग्रहण कार्यक्रम के तहत गांवों को गोद लेकर दे रहे स्वास्थ्य परामर्श
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बल्देयां में लोगों के बीपी और शुगर के किए टेस्ट
अमर उजाला ब्यूरो शिमला। परिवार दत्तक ग्रहण कार्यक्रम (फैमली एडॉप्शन कार्यक्रम) के तहत लोगों को अब घरद्वार बेहतर उपचार मिल जाएगा। इसके साथ स्वास्थ्य जांच भी होगी ताकि किसी को बीपी और मधुमेह की वजह से कोई बीमारी न लगे। डॉक्टर सेहत कैसे दुरुस्त रखें इसका परामर्श भी देंगे।
राजधानी शिमला में इसकी शुरुआत हो चुकी है। कार्यक्रम के तहत गांवों को गोद लेकर डॉक्टर वहां रहने वाले परिवारों के हर सदस्य की स्वास्थ्य जांच करते हैं। इसमें बीपी, शुगर, वजन और हिमोग्लोबिन की जांच की जाती है ताकि यह पता लगाया जा सके कि लोग कितने स्वस्थ हैं। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज शिमला के सामुदायिक चिकित्सा विभाग ने इस साल बल्देयां पंचायत में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के परिवार दत्तक ग्रहण का पहला कार्यक्रम (फैमली एडॉप्शन कार्यक्रम) का आयोजन किया।
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कॉलेज प्राचार्य डॉ. सीता ठाकुर और विभागाध्यक्ष डॉ. अनमोल गुप्ता के मार्गदर्शन में यह कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम में स्नातक शिक्षा विभाग की सह आचार्य डाॅ. अंजलि महाजन, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डाॅ. यशपाल रांटा, खंड चिकित्सा अधिकारी डाॅ. संजय रनौन ने सहयोग किया। कार्यक्रम में आईजीएमसी के चिकित्सकों ने बल्देयां, बाग, सीरियोला और मोहनपुर गांवों के 120 परिवारों को गोद लिया है। इन परिवारों के 500 से अधिक सदस्यों की इस दौरान एनीमिया जांच, वजन, ऊंचाई, रक्तचाप, मधुमेह और हीमोग्लोबिन की जांच की गई।
गांव मोहनपुर में भी यह कार्यक्रम हो चुका है। इस दौरान 118 लोगों की निशुल्क जांच की गई और उन्हें चिकित्सा परामर्श दिया गया। परिवार दत्तक कार्यक्रम के मंच से मोहनपुर गांव में नशा मुक्त रैली भी निकाली गई। चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. अर्चित शर्मा, डॉ. अनुज कौशल, डॉ. आकृति अग्निहोत्री, डॉ. अश्मिता, डॉ. रानो, डॉ. तमन्ना, डॉ. आशिमा और डॉ. सविता ने इस आयोजन में सहयोग किया। इसके अलावा भोंट पंचायत के टुड, रज्ञान, कामयाणा, मनाओ और भोंट गांव के 123 परिवारों को भी गोद लिया है। पंचायत बोह अभी यह कार्यक्रम होगा।
प्रारंभि चरण में लग जाएगी बीमारी का पता
कार्यक्रम का मकसद लोगों को बेहतर उपचार मुहैया करवाना है ताकि बड़े अस्पतालों में भीड़ कम हो। इसके साथ बीमारी का प्रारंभिक चरण में ही पता लगाकर उसका निदान किया जा सकेगा। गांव के लोग कई बार खेतीबाड़ी के कार्य के चलते अस्पताल जाने से कतराते हैं। इस देरी के कारण बीपी और शुगर की वजह से कई बार गंभीर बीमारियां हो जाती है। ऐसे में यह कार्यक्रम लोगों के लाभदायक साबित हो रहा है तथा शुरुआती दौर में ही बीमारी पकड़ में आ जाती है।