इनमें से 10 प्रतिशत मरीजों ने ही दाखिले से पहले एंटी स्क्रब एंटीबायोटिक दवाएं डॉक्सीसाइक्लिन या एजिथ्रोमाइसिन खाई थीं। दाखिल मरीजों में से 6.6 प्रतिशत यानी सात रोगियों की मौत हो गई।
इनमें किसी ने भी अस्पताल में पहुंचाए जाने से पहले एंटी एंटी स्क्रब एंटीबायोटिक दवाएं नहीं खाईं। अधिकतर मरीज अस्पताल में स्क्रब टायफस की चपेट में आने के बाद भी देरी से लाए गए। जिन मरीजों को पहले ही एंटी स्क्रब दवाएं दी गईं, उनका बचाव हो गया।
शोध में चिकित्सकों ने पाया कि जब स्क्रब टाइफस का सीजन चला हो तो डॉक्सीसाइक्लिन या एजिथ्रोमाइसिन को प्रारंभिक इंपीरिकल एंटी माइक्रोबियल थेरेपी में शामिल किया जाना चाहिए।
इसका मकसद स्क्रब टायफस से मौतें कम करना है। डॉ. मोक्टा ने कहा कि इस बुखार के सीजन में डॉक्टर को एंटी स्क्रब टायफस दवाइयों को जरूर देना चाहिए। अमेरिका जैसे देशों में भी ऐसे ही मानक हैं।
आजकल इस बुखार का सीजन नहीं हैं। फिर भी दो महीनों में 28 लोगों में स्क्रब टायफस पाया गया हैै। स्वास्थ्य निदेशालय के पास एक जनवरी से लेकर छह मार्च 2019 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 624 लोगों ने स्क्रब टायफस के संदेह पर टेस्ट करवाया।
इसके बाद कुल 28 मरीजों में से बिलासपुर में 9, चंबा में 2, हमीरपुर में 5, कांगड़ा में 10, शिमला में 2 और सोलन में 1 मरीज का नमूना पाजिटिव पाया गया। इनमें से छह मार्च को ही तीन मरीज स्क्रब टायफस के पॉजिटिव पाए गए। पिछले साल स्क्रब टायफस के कारण डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हुई।