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Shimla News: चरखे से काती ऊन की बनी पश्मीना शॉल से गेयटी में गरमाहट

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गेयटी में चल रही कुल्लू के हथकरघा उत्पादों की प्रदर्शनी में महिलाओं को खूब पसंद आ रही पश्मीना शॉल
प्रदर्शनी में 1,000 से 25000 रुपये तक बिक रही शॉल
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। आधुनिकता के युग में भले ही कपड़ों के नए डिजाइन बाजारों में पहुंच चुके हों लेकिन चरखे से काती ऊन की हाथों से बनाई पश्मीना शॉल हर किसी को आकर्षित करती है।
गेयटी थियेटर में चल रही प्रदर्शनी में पश्मीना शॉल की गरमाहट है। शॉल में लगी कुल्लू की रंग बिरंगी पट्टी इसकी खूबसूरती को चार चांद लगाती है। राजधानी के गेयटी थियेटर के टेवरन हॉल में लगी कुल्लू के हथकरघा उत्पादों की प्रदर्शनी में पश्मीना शॉल महिलाओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। प्रदर्शनी में कुल्लू पट्टी के कई शॉल प्रदर्शित किए हैं। यह शॉल कुल्लू के बुनकरों द्वारा हाथों से बनाए गए हैं। इन्हें बनाने में याक वूल, रैबिट वूल और लैंब वूल का इस्तेमाल किया गया है। यह प्रदर्शनी द कुल्लू हैंडलूम एंड हैंडीक्राफ्ट की ओर से आयोजित की जा रही है। प्रदर्शनी में यह शॉल स्टाल 1,000 से 25000 रुपये तक बिक रही है। प्रदर्शनी के आयोजक विनोद सेठिया ने बताया कि पश्मीना शॉल तैयार करने में एक हफ्ते से ज्यादा समय लग जाता है।
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ऐसे तैयार होती है पश्मीना शाॅल पश्मीना शॉल बनाने के लिए सबसे पहले ऊन इकट्ठा की जाती है। चंगथांगी बकरियां केवल सर्दियों में बहुत महीन ऊन पैदा करती हैं। इसके बाद वसंत ऋतु में जो ऊन पैदा होती है उसे इकट्ठा करने के बाद कच्चे रेशों की सफाई और छंटाई की जाती है। इसके बाद साफ की ऊन की कताई की जाती है जिसे पारंपरिक चरखे की मदद से महीन धागे में बदला जाता है। इसके बाद काते गए हुए धागों को बुनकर पारंपरिक लकड़ी के हथकरघों पर बुनते हैं। बुनाई के बाद इसमें रंगाई की जाती है। अंत में इसे सुई और धागों से डिजाइन बनाकर शॉल तैयार की जाती है।
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