किसान फसलों की कटाई करने के बाद खेतों में फसल के तने के अधिकतर भाग को खेत में जला देते हैं। इससे न केवल वातावरण में प्रदूषण के स्तर में इजाफा होता है, बल्कि स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
देश में पिछले दो वर्षों में फसलों के 52 प्रतिशत बचे अवशेषों को जलाना कम हुआ है। इससे वायु प्रदूषण भी 20 से 25 फीसदी घटा है। अब इन अवशेषों का इस्तेमाल होने लगा है। इसकी जानकारी नौणी विवि में हुए दो दिवसीय राष्ट्र स्तरीय कृषि विज्ञान केंद्र सम्मेलन के दौरान केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने दी। उन्होंने बताया कि अवशेषों का इस्तेमाल अब किसान खाद और प्राकृतिक खेती के लिए करने लगे हैं।
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जानकारी के अनुसार किसान फसल के अवशेषों से प्राकृतिक खाद और खेतों में नमी बरकरार रखने के लिए इनसे मल्चिंग कर रहे हैं। अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अंधाधुंध रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे मृदा के साथ-साथ पर्यावरण पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है। फसलों के बचे अवशेष को जलाना भी पर्यावरण तथा मृदा प्रदूषण का महत्वपूर्ण कारण है।
किसान फसलों की कटाई करने के बाद खेतों में फसल के तने के अधिकतर भाग को खेत में जला देते हैं। इससे न केवल वातावरण में प्रदूषण के स्तर में इजाफा होता है, बल्कि स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। फसल के अवशेषों को जलाने के कारण मृदा ताप में वृद्धि होती है, जिस कारण मृदा की सतह सख्त हो जाती है। इससे मृदा की जलधारण क्षमता में कमी, वायु संचरण, मिट्टी में कार्बन समेत मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीवियों का नाश हो जाता है। अब किसान जागरूक हो रहे हैं। किसान अब इन अवशेषों का इस्तेमाल मशरूम खाद तैयार करने के लिए भी कर रहे हैं।